‘वरुण नहीं ये आंधी है, ये दूसरा...संजय गांधी है’
बुधवार, 18 मार्च 2009पीलीभीत में वरुण के जहरीले भाषण पर शिवसेना ने उनकी खूब वाहवाही की है। शिवसेना ने बीजेपी को भी सलाह दी है कि अपने इस युवा नेता को समझो। इस बालक में आग है। इस आग को शांत मत होने दो। शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में बाल ठाकरे ने वरुण के जहरीले बोल को मीठी वाणी की तरह मानते हुए वरुण की वाहवाही की है। उन्होंने लिखा कि वरुण ने लोगों में दहक रही आग को उगला। वरुण के मन की आग को बुझाओ मत। ये गांधी दूसरों से अलग है। वरुण नहीं ये आंधी है... ये दूसरा संजय गांधी है। ये वंश परंपरा का उदाहरण है।
मालूम हो कि बाल ठाकरे को वरुण में नये जमाने का गांधी दिख रहा है। इसमें उन्हें महात्मा गांधी से अलग संजय गांधी की परछाई दिखाई दे रही है। मुख पत्र में बाल ठाकरे ने लिखा कि हमें होनहार वरुण गांधी ने संजय गांधी की याद दिला दी। ऐसा लगा कि वरुण गांधी के मुख से संजय गांधी का पुनर्जन्म हुआ है। चिरायु वरुण में अपने स्वर्गीय पिता संजय गांधी के सारे गुण आए हैं।
शिवसेना नेता और सामना के कार्यकारी संपादक संजय राउत का कहना है कि जो भी शख्स हिंदुत्व की बात करेगा तो पार्टी और शिवसेना प्रमुख उसे पूरा समर्थन देंगे।अपने पूरे जीवन में गांधी परिवार को कोसने वाले बाल ठाकरे को गांधी नाम से प्यार हो गया है। उन्होंने ऐलान कर दिया है कि हिंदुत्व की बात करने वाला ये गांधी हमारा है। ठाकरे ने वरुण की तारीफ की वहीं बीजेपी की खिंचाई कर दी। ठाकरे लिखते हैं कि कांग्रेस के साथ साथ बीजेपी के भी कुछ नेता वरुण के इस बयान अपने को अलग कर रहे हैं। लेकिन वरुण ने जिस निर्भीकता से अपना पक्ष रखा है उसे बीजेपी को समर्थन देना चाहिए।
राजनीति अब वंशवाद की ओर
मंगलवार, 10 मार्च 2009वंशवाद, परिवारवाद ये सब डिक्शनरी के लफ्ज थे। लेकिन अब इन लफ्जों को बीजेपी ने बड़ी सहजता से अपने पार्टी कल्चर में उतार लिया है। अब दक्षिण भारत में बीजेपी के झंडा बुलंद करने वाले कर्नाटक के पहले भाजपा मुख्यमंत्री येद्युरप्पा को ही लाजिए। अभी मुख्यमंत्री बने नहीं कि विरासत की चिंता सताने लगी। इसलिए मैदान में उतार दिया अपने बेटे राघवेंद्र को। राघवेंद्र कर्नाटक में शिमोगा से बीजेपी के उम्मीदवार हैं।
बीजेपी के दूसरे लाल स्मार्ट, गुडलुकिंग, हैंडसम अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे हैं। राज्य में क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। लेकिन इससे पेट नहीं भरा। धूमल ने जब हमीरपुर की सीट छोड़ी तो बैट पकड़ा दिया अपने बेटे को। नेता बन गए तो अब बात भी नेताओं की तरह करते हैं। ‘मैं पहले से क्रिकेट एसोसिएशन का अध्यक्ष था और बहुत मेहनत करनी पड़ी है। हमारे यहां जो काम करता है उसे ही टिकट दिया जाता है।“
परिवारवाद पर थूथू करने वाली बीजेपी के सिर्फ यही दो लाल नहीं हैं। वसुंधरा सीएम बनीं तो बेटे दुष्यंत सिंह को झालावाड़ से एमपी बना दिया। वे अब फिर चुनाव लड़ रहे हैं। वसुंधरा ऐसा कर सकती हैं तो जसवंत सिंह क्या राजस्थान के कोई छोटे नेता हैं। खुद राज्यसभा में और उनके लाल मानवेंद्र बाड़मेर से लोकसभा में। मानवेंद्र फिर चुनाव लड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की लुटिया डूब गई लेकिन प्रदेश में पार्टी के बड़े नेता ओमप्रकाश सिंह का कुछ नहीं बिगड़ा। खुद विधायक हैं और बेटे को एमपी का टिकट दिलवा दिया।
मेनका गांधी की गांधी परिवार से नहीं बनीं तो उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया। रास्ता तो बदला लेकिन गांधी परिवार की तरह डायनेस्टी पोलीटिक्स में उनका विशवास बना रहा। इसलिए वरुण गांधी को राजनीति में उतार दिया। मां मेनका आंवला से तो बेटा वरुण यूपी के पीलीभीत से बीजेपी के उम्मीदवार हैं। ये तो वो हैं जिन्हें चुनाव लड़ने की हरी झंडी मिल गई है। कई कतार में हैं। साहब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा। प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन। उड़ीसा में देवेंद्र प्रधान के सांसद बेटे धर्मेंद्र प्रधान।
सचिन का सपना पूरा हो न सका
सोमवार, 9 मार्च 2009टीम इंडिया ने क्राइस्टचर्च वनडे में न्यूजीलैंड को 58 रन से करारी शिकस्त दी। इसी के साथ 5 मैचों की सीरीज में भारत ने 2-0 की अजेय बढ़त ले ली है। यानी पहली बार टीम इंडिया का न्यूजीलैंड में सीरीज जीतने का सपना पूरा हो सकता है। मगर इस सबके बीच सचिन का 19 साल पुराना सपना पूरा नहीं हो सका।सचिन जिस रफ्तार से रन बना रहे थे यही लगा कि वो 200 रन बनाकर ही दम लेंगे। मगर पेट की मांसपेशी में खिंचाव की वजह से रिटायर्ड हर्ट होकर वो बैटिंग छोड़कर पवेलियन लौट गए। मास्टर ब्लास्टर को ये दर्द का एहसास अर्धशतक जड़ने के बाद ही हो गया था। सचिन के मुताबिक 'जब मैं 70 रन के करीब थे तभी दर्द महसूस होने लगा था। मगर बाद में दर्द और बढ़ गया। मुझे मालूम था कि मैं अपने साथ गलत कर रहा हूं। यही वो समय था जब मैने फैसला किया कि मैदान से बाहर चला जाऊं।'सचिन को 150 रन बनाने के बाद 200 का आंकड़ा सामने दिखाई दे रहा था। मगर मास्टर ब्लास्टर का ये सपना टूट गया।सचिन ने कहा कि 'जब मैंने 150 रन पार किए तो एक बार लगा कि मैं वनडे में पहला दोहरा शतक लगा सकता हूं। मगर अचानक दर्द बढ़ने लगा। ऐसे में मैंने फैसला लिया कि अगर आज जोखिम उठाया तो आगे के लिए ठीक नहीं होगा।"तमाम अगर मगर के बावजूद ये सचिन की एक और बेहतरीन पारी थी। अब चौथे वनडे में सचिन खेलेंगे या नहीं इसपर वो सोमवार को फैसला लेंगे।अगर सचिन का एक सपना टूट गया तो एक ख्वाहिश पूरी भी हुई। अपने 19 साल के करियर में आज से पहले सचिन ने कभी भी न्यूजीलैंड में शतक नहीं ठोका था। क्राइस्टचर्च में 43वीं सेंचुरी जड़ने के बाद सचिन ने अपनी और अपने फैन्स की ये तमन्ना भी पूरी कर दी। इस मैच में सचिन को 'मैन ऑफ द मैच' से नवाजा गया।दरअसल न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में पहले बल्लेबाजी करने उतरी टीम इंडिया ने सहवाग का विकेट जल्द ही गंवा दिया। सचिन ने आते ही कीवी फील्डर्स को मैदान के चारों ओर खूब दौड़ाया। पहले युवराज सिंह के साथ मिलकर सचिन ने दूसरे और तीसरे पावर प्ले का भरपूर फायदा उठाया और जल्द ही अपना अर्धशतक पूरा कर लिया। उसके बाद सचिन ने 10 चौकों और 2 छक्कों के साथ अपना शतक 101 गेंदों में पूरा कर लिया।लेकिन शतक पूरा करते ही सचिन ने रन बनाने को रफ्तार तेज कर दिया। मानों जैसे वो 200 रन बनाने के मूड में थे। लगातार चौकों और छक्कों की बारिश के साथ ही सचिन ने अपने 150 रन भी पूरे किए। 163 रनों के निजी स्कोर पर सचिन को मांसपेशियों में खिंचाव हुआ और वो रिटायर्ड हर्ट होकर पवेलियन वापिस लौट गए। अपनी 163 रनों की पारी में सचिन ने 16 चौके और 5 छक्के लगाए।आज सचिन की पारी को देखकर लगा जैसे की करीब 10 साल पहले का सचिन मैदान पर हो। वही जोश वही जज्बा और वही कलात्मक स्ट्रोक्स। वहीं क्राइस्टचर्च में आज मास्टर ब्लास्टर के बल्ले ने जो आग उगली उसने तमाम आलोचकों का मुंह बंद कर दिया। जो लोग उनकी उम्र और फॉर्म को लेकर कोसते रहते थे उन्हें आज सचिन ने मुंहतोड़ जवाब दिया है। आलोचकों को हमेशा शिकायत रही कि सचिन मैच विनर नहीं हैं। मगर क्राइस्ट चर्च में सचिन की आतिशी पारी ने साबित कर दिया कि वो टीम इंडिया के सबसे बड़े मैच विनर हैं।क्राइस्टचर्च में जबर्दस्त पारी खेलने के बाद तेंदुलकर ने कहा कि 'मैं अपने पूरे करियर में इससे मजबूत बैटिंग लाइन अप का सदस्य नहीं रहा। इस लाइन अप में ऐसा बल्लेबाज है जो जब चाहे गेंद सीमारेखा के पार कर सकते हैं और इस लाइन अप के लिए कोई भी टार्गेट बड़ा नहीं'गौरतलब है कि कपिल, अजहर, सिद्धू, राहुल और सौरव जैसे वर्ल्ड क्लास बल्लेबाजों के साथ खेल चुके तेंदुलकर का ये बयान काफी अहमियत रखता है। इससे पहले सहवाग ने कहा था कि मौजूदा टीम हर मैच में 300 रन बनाने का माद्दा रखती है।
भारत एक दुश्मन अनेक
कहते हैं अच्छा पड़ोसी खुशियां लाता है। परेशान पड़ोसी दर्द देता है। लेकिन यहां तो भारत को पड़ोसियों से दर्द नहीं बल्कि आग मिल रही है। भारत चौतरफा घिर चुका है। और सबसे डरा देने वाली बात ये है कि ये खतरा एक साथ नहीं आने वाला। बल्कि टुकड़ों-टुकड़ों में भारत को नुकसान पहुंचाने वाला है।पाकिस्तान की सेना ने 90 के दशक में भारत को नुकसान पहुंचाने के लिए एक रणनीति बनाई। जिसे नाम दिया मिशन थाउजेंड कट्स यानि एक हजार वार। छोटे-छोटे। जो भारत को लगातार तबाह करते रहें। कौन करता ये वार। पाकिस्तानी सेना ने खोजे आतंकवादी। उन्हें जन्म दिया। पाला पोसा। और आज वो उसी को खा रहे हैं। पाकिस्तान खुद तबाह हो चुका है। लेकिन थाउजेंड कट्स का जो बम उसने बनाया उसके छर्रे से भारत भी घायल हो रहा है लगातार। लेकिन इस बार ये खतरा छोटा नहीं है। अब तालिबान पाकिस्तान पर कब्जे की कोशिश कर रहा है। और अगर नक्शे में तालिबान के राज की ताजा स्थिति देखें तो वो भारत से महज पांच घंटे की दूरी पर है। और उसे आगे बढ़ने से पाकिस्तान भी नहीं रोक सकता।सूत्रों के मुताबिक देश की खुफिया एजेंसियों ने कैबिनट कमेटी को एक रिपोर्ट सौंपी है। जिसमें साफ कहा गया है कि भारत चौतरफा खतरों से घिर चुका है। जिसमें सबसे बड़ा खतरा तालिबान से है। भारत में छुपे बैठे उसके लोग उससे जेहाद के नए तरीके सीखकर नए तरीके से हमले करने से गुरेज नहीं करेंगे। ये भी तय है कि पाकिस्तान की कमजोर सरकार उन्हें रोक नहीं पाएगी। लाहौर पर हमला हुआ श्रीलंका टीम पर। ये सबकुछ भारत की सीमा से महज आधे घंटे की दूरी पर हुआ। और इस हमले ने ये साबित कर दिया कि लश्कर की पहुंच से कुछ भी दूर नहीं। तो लाहौर से आधे घंटे की दूरी पर अमृतसर महफूज कैसे हो सकता है।भारत के दक्षिणी मुहाने पर एलटीटीई घात लगाकर बैठा है। वहां से आगे बढ़े तो बांग्लादेश में आतंकी भारत में घुसने की फिराक में हैं। वहां पर बीडीआर की बगावत ने कोढ़ में खाज का काम किया है। लिट्टे के लड़ाके हजारों भारतीय सैनिकों की जान ले चुके हैं। राजीव गांधी की हत्या का पाप इनके सिर पर है। अब श्रीलंका की सेना इनकी गुर्राहट बंद कर रही है। लेकिन क्या ये खत्म हो जाएंगे। ये ऐसा सवाल है जिससे भारत भी जूझ रहा है। ऐसी आशंका है कि लिट्टे के कई खूंखार लड़ाके समुद्री रास्ते से भारत में पनाह ले रहे हैं। और वो देश में एक नए विवाद को जन्म दे सकते हैं। अपनी जन्मभूमि से बेदखल होकर वो भारत में एक नया उत्पात खड़ा कर सकते हैं। यही नहीं भारत में अपने संपर्कों को वो पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों लश्कर ए तैयबा और हरकत उल मुजाहिदिन जैसे संगठनों की मदद के लिए भी इस्तेमाल कर सकता है।बांग्लादेश सरकार ने कहा है कि बीडीआर की बगावत में बाहरी हाथ था। यानि बाहरी हाथ की साजिश ने पूरे बांग्लादेश को हिला दिया। जाहिर है ये हाथ यहीं नहीं रुकेंगे। ये वही हाथ हैं जो भारत के खिलाफ बांग्लादेश में आतंकवादी कैंप चलाते हैं। उल्फा को हथियार देते हैं। हूजी से हाथ मिलाते हैं। ये हाथ आईएसआई का भी हो सकता है। बीडीआर की बगावत के बाद ये हाथ और मजबूत हो गए हैं। क्योंकि बांग्लादेश की भारत से सटी सीमा की रक्षा बी़डीआर के जवान करते हैं। उनके बिगड़ने के बाद भारत में घुसपैठ और हथियारों की तस्करी और आसान हो जाएगी। साथ ही बांग्लादेश की अस्थिरता का आतंकी अपने हित में हर तरह से इस्तेमाल करेंगे।खतरे का एक सिरा जाकर मिलता है नेपाल में। जहां आईएसआई कुंडली मारकर बैठी है। नेपाल में वो अपनी जड़े मजबूत कर रही है। भले ही उसका देश तालिबान के मुंह में जा रहा है। लेकिन उसकी तो सांस इसी बल पर चलती है कि वो भारत के खिलाफ साजिशें रचता है। अपनी सेना के नापाक गठजोड़ से भारत को चोट पहुंचाता है। क्या इसका कोई हल है। कौन करेगा भारत के इस सिरदर्द का अंत।भारतीय खुफिया एजेंसियों ने कैबिनेट कमेटी को जो रिपोर्ट सौंपी है उसमें साफ साफ लिखा है कि नेपाल में मौजूद पाकिस्तानी दूतावास आईएसआई का सबसे बड़ा अड्डा बन चुका है। ऐसा अड्डा जिसमें मौजूद ज्यादातर अफसर भारत के खिलाफ गतिविधियों में लगे हुए हैं। जी हां यही अधिकारी नेपाल में भारत विरोधी साजिशों को हवा देते हैं। नेपाल में मौजूद अधिकारी वो सबकुछ करते हैं जो भारत में अस्थिरता फैला सके।तो सारे पड़ोसी देशों में भारत के खिलाफ साजिश रचने वाला कोई न कोई है। आखिर इससे निपटने का हल क्या है।
अश्लीलता नहीं, ये जीवनशैली है
रविवार, 22 फ़रवरी 2009अश्लीलता नहीं, ये जीवनशैली है
समाज में अश्लीलता को अभिशाप की उपाधि दी जाती है। लेकिन उपाधि देने वाले भी इससे कोई परे नहीं। समाज के कुछ ठेकेदारों ने तो इसके लिए पश्चिमी सभेयता संस्कृति को दुहाई देते हैं कि हमारे समाज में पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति हावी हो रही है। लेकिन वे अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखते। देखे भी क्यों ? वे आजाद देश में रहते है संविधान द्वारा कुछ भी कहने का अधिकार प्राप्त है। फिर किस बात की चिंता।
आज वैश्वीकरण के दौर में हम शामिल हैं। विश्वशक्ति को टक्कर देने की मादा रखते हैं। परंतु रहन-सहन की बात आते ही सभ्यता-संस्कृति और ढोंगापंथी जिम्मेदारी को सामने लाकर दूसरों को कोसना शुरू कर देते हैं। आखिर क्यों और कब तक.....?
फिल्म सीरियल को देखते ही दो टूक में कह देते हैं कि सीधे अश्लीलता को परोसा गया है। इससे हमारी संस्कृति क्षीण हो रही है और हाथ में झंडा लेकर निकल जाते हैं कि इसे हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम सच्चे देशप्रेमी हैं। लेकिन देश के लिए मर-मिटने की बात करें तो वो कोसो दूर तक नजर नहीं आएंगे। इस बिडंबना कहे या कुछ और आजादी की साठ साल बीते जाने के बाद भी इसका सही जवाब नहीं है।
चंद समय के लिए मान भी लें कि पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति शहरों में दस्तक दे रही है। लेकिन बात तब हजम नहीं होती जब कोसो दूर-दराज के गांवों पर नजर जाती है। जो आज भी तमाम बुनियादी सुविधाओं से दूर है। जो कि कोसो दूर है शहर की रंगीली छाया से। वो तो दो जून की रोटी के लिए दिन भर जीतोड़ मेहनत करते हैं। उन्हें तो अपनी भूख मिटाने की पड़ी होती है। ना कि पहनने-ओढ़ने की तौर-तरीके की। लेकिन खुलापन की बात करें तो वहां भी बदलाव की रीत बहती नजर आती है। वे लोग भी अपने तरीके से शहरों को टक्कर देने की क्षमता रखते हैं। भला उन्हें क्या पता कि क्या है हमारी सभ्यता और क्या पश्चिमी सभ्यता.....?
जो खुलापन शहर में फिल्म, सीरियल नाईट क्लबों में देखने को मिलते है वही खुलापन गांव के नाटक-नुक्कड़, गली-चौराहे, कस्बों में असानी से दिखने को मिल जाते हैं और वे तो उसे एक जिंदगी के हिस्सा मानते है।
देखने वाली बात यह है कि उन्हें किसी से कोई शिकायत भी नहीं है। अपनी मर्जी से जिंदगी जीते है। जिसे अश्ललीलता कहे या कुछ और उन्हें कोई परवाह नहीं। फिर ढो़गांपंथी दिखाने वाले क्यों परेशान होते हैं ? उन्हें भी कोई हक नहीं है कि दूसरों की सभ्यता-संस्कृति को कोसने की और बदलते परिवेश को अश्लीलता कहकर पल्ला झाड़ लेने की।
बेहतर होगा कि स्वीकार कर लें कि ये सब किसी की देन नहीं है ना ही इससे कोई दूर नहीं है। समय बदल चुका है, जाहिर है समय के साथ-साथ सबकुछ बदल रहा है, रहन-सहन, खान-पान, शान-शौकत। माने लें कि देर से ही सही पर हनारे बीच खुलापन आ चुका है। बस अपनाने की जरुरत है और देखने की नजरिया में बदलाव लाने की जरुरत है। इसी में भलाई है।
इससे अलावे एक अपनी आदत को बदलने की कोशिश करें और अश्लीलता जैसे भद्दे शब्द के बदले खुलापन कहने की आदत डाल लें। ताकि आने वाले दौर को अगुंली उठाने का मौका न मिलें।
वोट मत मांगना! वरना...
लोकसभा चुनाव सिर पर है। राजनीतिक पार्टियों ने भी चुवानी अखाड़े में उतरने की पूरी तैयारी कर ली है। लेकिन इस बीच देश की जनता मायुस और गुस्से में हैं। जनता की नाराजगी की भनक पार्टियों को भी लग चुकी है और मनाने की रणनीति भी तैयार की जा रही है। कहते हैं कि जनता सब जानती है। लेकिन अब यह कहावत पुरानी हो चुकी है। अब कुछ हदतक कह सकते हैं कि जनता सब कुछ जानती ही नहीं पूछती भी है।
हाल में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों से ये तस्वीर साफ हो गई कि जनता बुनियादी सुविधाओं को असली चुनावी मुद्दा मानती है। मंदिर, मस्जिद और न जाने इस तरह के कई मुद्दे हैं जिसके सहारे पार्टियां चुनावी बैतरनी पार करने की कोशिश करने की कोशिश करती है और आगे करेगी। पर सच्चाई ये है कि ज्यादातर जनता-जनार्दन इसे मुद्दा ही मानती।
जनता तो रोटी, कपडा़ और मकान जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर नेताजी से हिसाब-किताब करना चाहती है। फीलगुड और डील या नो डील की बात तो तब होगी जब पेट में रोटी, तन पर कपड़े और सिर छुपाने के लिए छत होंगे। जिस के नीचे बैठकर फीलगुड और डील या नो डील के बारे में मंत्रणा करेंगे।
देश की आबादी की 70 फीसदी लोग गांव में बसते हैं पर उनकी हालत आज भी अंधेर नगरी चौपट राजा से कम नहीं है। आप सोचेंगे कि सरकारी खजाने से अरबों रुपए गांव के विकास के लिए रोजगार गारंटी योजना, भरण पोषण योजना जैसे तमाम स्कीमों के तहत खर्च किए जा रहे हैं फिर ये हालात।
आप यकीन कीजिए, मैं भी एक छोटे से गांव से आता हूं। जिसे अभागा गांव कहे या गांव होने का अभिशाप! जहां की स्थिति 10 साल पहले की तुलना में अभी भी कुछ ज्यादा बदलाव नहीं आया है। सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और रोजगार की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। हां, ये जरूर है कि लोग मोबाइल पर बात करने लगे हैं। इसके अलावा एक बड़ा परिवर्त्तन हुआ जो सामने उभरकर दिखता है। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए की सरकार थी और लोग आपस में भारत उदय, फील गुड जैसे मुद्दों पर बातें करते थे। और अब शायद एकबार फिर डील या नो डील पर आपस में मंत्रणा करेंगे। लेकिन हैरानी की बात ये है गांव के लोग इसे अपनी दिनचर्या ने जोड़कर नहीं देखते हैं। वो तो इसे शहरी बाबू की शान-शौकत से जोड़कर केवल प्रशंसा करते हैं।
मुझे उम्मीद है आप यहीं सवाल खड़े करेंगे कि एक गांव से पूरे देश की हालत की तुलना नहीं की जा सकती। हां, ये सच है मैं आपकी भावनाओं का कद्र करता हूं और मानता हूं कि कि गांवों में देश की आत्मा वास करती है। लेकिन अब वो आत्मा धीरे-धीरे दम तोड़ती जा रही है। मैं एक बार फिर आपको यकीन दिलाना चाहूंगा कि देश के अधिकतर गांवों की स्थिति कमोवेश एक जैसी है। कहीं के किसान ऊपज नहीं होने से खुदकुशी कर रहे हैं तो कहीं के किसान अपनी भूमि को बचाने के लिए जान दे रहे हैं।
अगर किसान की समस्या को थोड़ी देर के लिए नरअंदाज भी कर दें तो भी निचले तबके के लोग पेट भरने के लिए मंदी की वजह से रोजगार छिन जाने से मौत को गले लगा रहे हैं या फिर अपराध की दुनिया में कदम रख रहे हैं।
जहां तक विकास की बात है तो बड़े-बड़े शहरों में उसकी चकाचौंध देखी जा सकती है। बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लैक्स सिनेमा हॉल, मेट्रो, क्लब और आलीशान इमारतों को देखकर लगता है कि ये है नई सदी का भारत। जो कि वैश्वीयकरण के इस दौर में कदम से कदम मिलाकर चल रहा है। लेकिन गांवों के बिना संपूर्ण भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। और जब उस शॉपिंग मॉल के सामने खड़े होकर देश की 70 फीसदी आबादी की दिशा और दशा के बारे में कुछ पल सोचते हैं तो शॉपिंग मॉल की तस्वीर और भारत की हकीकत धूमिल पड़ जाती है। बिना गांव के विकास हुए देश की समुचित विकासदर को पाना कतई मुमकिन नहीं है।
दरअसल ये सारी समस्याएं तो गांव वालों के लिए दिनचर्या का हिस्सा है। लेकिन इसकी सुगबुगाहट दूसरे छोर तक प्रत्येक 5 साल बाद चुनावी सरगर्मी के बीच ही पहुंच पाती है। पक्ष-विपक्ष, लेफ्ट-राइट सभी चुनावी अखाड़े में एक-दूसरे पर भारी पड़ने के लिए या कहें जनता को अपनी ओर करने के लिए इन मुद्दों को उठाते हैं। मुमकिन है कि इसबार भी सभी दलों द्वारा चुनावी अखाड़ों में ये दावें चली जाएगी। लेकिन इन सबके बीच जनता धीरे-धीरे अपने नेताओं की नब्ज टटोलने में कामयाबी हासिल कर रही है। जिसका जीता जागता सबूत है मुंबई आतंकी हमलों के बाद देश की जनता का गुस्सा नेताओं के प्रति जहर बनकर निकला। पहली बार बड़े तादाद में लोगों ने सड़क पर उतरकर नेताओं के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर की। जिसे मीडिया के माध्यम से पूरे देश की जनता ने देखी और शायद सबक भी ली होगी। उम्मीद है कि सबक ही नहीं कमर भी कस ली होगी क्योंकि लोकसभा चुनाव दहलीज पर है। निश्चिततौर पर जनता-जनार्दन अपने-अपने नेताओं से 5 साल पहले किए वादों का एक-एक कर हिसाब लेंगी। जो अपने वादों पर खरे उतरेंगे उन्हें तो फिर खुशी-खुशी संसद भवन तक दोबार पहुंचाने के लिए वोट डालेगी। वहीं जो केवल वादों के नेता निकलेंगे उन्हें तो शायद जनता यही कहेगी वोट मत मागना! वरना अच्छा....
अमित कुमार (मीडिया फेस)
