तीन देवियां के बीच टिकी सरकार की राह
गुरुवार, 14 मई 2009Posted by
media.face
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अंतिम और पांचवें चरण के चुनाव संपन्न होते ही जोड़तोड़ का गणित शुरू हो गई है। मतगणना तो 16 मई को होगी लेकिन रूठने-मनाने का दौर शुरू हो गया है। देश की दो बड़ी पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस जादूई आंकड़ा 272 को स्पर्श करने के लिए अन्य साथियों को अपने पाले में लेने के लिए कोशिश तेज कर दी हैं।
इस कड़ी में आज सोनिया गांधी के घर पर कांग्रेस महासचिवों की बैठक हो रही है। देर शाम को एक और कोर कमिटी की बैठक हो सकती है।
कांग्रेस को आंकड़े तक पहुंचने के लिए राजनीति की तीन देवियां यानी माया, जया और ममता का साथ चाहिए। ममता तो कांग्रेस के खेमे में शामिल हैं लेकिन माया और जया से अभी तक कांग्रेस की दूरी बनी हुई है। ये दूरी 16 मई तक रहेगी। 16 मई के बाद अगर ये तीनों देवियां कांग्रेस के साथ होंगी तो सत्ता में फिर से यूपीए काबिज हो सकता है। लेकिन वामदलों से कांग्रेस की नजदीकियां बढ़ते ही ममता से दूरियां बढ़ जाएगी।
पांचवें और अंतिम चरण के बाद आईबीएन7 और दैनिक भास्कर ने सीएसडीएस के साथ मिलकर वोटरों की नब्ज को टटोलने के लिए एक सर्वे किय़ा। सर्वे की मानें तो कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर रही है। जबकि अगर यूपीए की बात करें तो यूपीए के खाते में 185 से 205 सीटें जाते दिख रही हैं।
इस आंकड़े को आधार मानकर चलें तो यूपीए को सरकार बनाने के लिए कुल 272 सीटें चाहिए यानी यूपीए को सत्ता में फिर से काबिज होने के लिए 67 से 87 सांसदों को अपने पाले में लेने होंगे।
अब ये सीटें कहां से आएंगीं इस पर एक नजर डालते हैं। तमिलनाडु में डीएमके यूपीए के साथ है लेकिन अगर एआईएडीएमके को चुनाव के बाद पलड़ा भारी होता है तो फिर क्या तस्वीर बनकर उभरेगी। फिलहाल तो कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन की ओर से कहा जा रहा है कि कांग्रेस डीएमके से अपना समर्थन वापस नहीं लेगी।
अगर देश के सबसे बड़े राज्य य़ूपी की बात करें तो यहां सपा और कांग्रेस दोनों चुनाव मैदान में अलग-अलग हैं। लेकिन चुनाव के बाद दोनों को साथ आना दोनों की मजबूरी है। वैसे कांग्रेस सपा को बॉय-बॉय कर बीएसपी से हाथ मिलाने में भी नहीं हिचकेगी। क्योंकि सूबे में सपा की जमीन खिसकती नजर आ रही है। वहीं मायावती को बढ़त मिलने के आसार है। ऐसे में कांग्रेस सपा और बीएसपी दोनों में से किसी की भी सवारी कर सकती है। लेकिन मायावती की नजर तो पीएम की कुर्सी पर है। वहीं मुलायम का कहना है कि नतीजे आने पर ही आगे की रणनीति बनाएंगे। यानी खेल अभी बाकी है। लेकिन मैदान तैयार है।
अगर बिहार में लालू-पासवान की बात करें तो दोनों की राजनीतिक जमीन पर नीतीश ने दस्तक दे दी है। दोनों दबी जुबान यूपीए के साथ होने की बात करते हैं पर कांग्रेस की नजर तो नीतीश पर है। गाहे-बगाहे सोनिया-राहुल नीतीश के बखान करते रहते हैं। लेकिन नीतीश ने एनडीए के साथ ही रहने का भरोसा दिलाया है। ऐसे में कांग्रेस के लिए वहां लालू-पासवान को साथ लेना एक मजबूरी है।
वैसे, लालू यादव यादव का कहना है कि मीडिया में जो दिखाया जा रहा है वो सच नहीं है। वो 16 मई के बाद ही पटना से दिल्ली आएंगे और अपना पत्ता खोलेंगे।
बिहार से हटकर पश्चिम बंगाल पर नजर डालें तो वहां कांग्रेस के साथ ममता बनर्जी है। अगर कांग्रेस वाम दलों को साथ लेता है तो ममता से किनारा करना होगा। लेकिन वाम दल कांग्रेस से खफा हैं। वहीं उड़ीसा में बीजेडी पर कांग्रेस की नजर है। लेकिन सारा खेल 16 मई को ही शुरू होगा। सबकुछ चुनावी नतीजे पर निर्भर करेगा। कांग्रेस के लिए एक बड़ी समस्या ये है कि किस पार्टी की सवारी कर नैय्या पार की जाए। क्योंकि ये तो जोड़तोड़ की राजनीति है।
इस कड़ी में आज सोनिया गांधी के घर पर कांग्रेस महासचिवों की बैठक हो रही है। देर शाम को एक और कोर कमिटी की बैठक हो सकती है।
कांग्रेस को आंकड़े तक पहुंचने के लिए राजनीति की तीन देवियां यानी माया, जया और ममता का साथ चाहिए। ममता तो कांग्रेस के खेमे में शामिल हैं लेकिन माया और जया से अभी तक कांग्रेस की दूरी बनी हुई है। ये दूरी 16 मई तक रहेगी। 16 मई के बाद अगर ये तीनों देवियां कांग्रेस के साथ होंगी तो सत्ता में फिर से यूपीए काबिज हो सकता है। लेकिन वामदलों से कांग्रेस की नजदीकियां बढ़ते ही ममता से दूरियां बढ़ जाएगी।
पांचवें और अंतिम चरण के बाद आईबीएन7 और दैनिक भास्कर ने सीएसडीएस के साथ मिलकर वोटरों की नब्ज को टटोलने के लिए एक सर्वे किय़ा। सर्वे की मानें तो कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर रही है। जबकि अगर यूपीए की बात करें तो यूपीए के खाते में 185 से 205 सीटें जाते दिख रही हैं।
इस आंकड़े को आधार मानकर चलें तो यूपीए को सरकार बनाने के लिए कुल 272 सीटें चाहिए यानी यूपीए को सत्ता में फिर से काबिज होने के लिए 67 से 87 सांसदों को अपने पाले में लेने होंगे।
अब ये सीटें कहां से आएंगीं इस पर एक नजर डालते हैं। तमिलनाडु में डीएमके यूपीए के साथ है लेकिन अगर एआईएडीएमके को चुनाव के बाद पलड़ा भारी होता है तो फिर क्या तस्वीर बनकर उभरेगी। फिलहाल तो कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन की ओर से कहा जा रहा है कि कांग्रेस डीएमके से अपना समर्थन वापस नहीं लेगी।
अगर देश के सबसे बड़े राज्य य़ूपी की बात करें तो यहां सपा और कांग्रेस दोनों चुनाव मैदान में अलग-अलग हैं। लेकिन चुनाव के बाद दोनों को साथ आना दोनों की मजबूरी है। वैसे कांग्रेस सपा को बॉय-बॉय कर बीएसपी से हाथ मिलाने में भी नहीं हिचकेगी। क्योंकि सूबे में सपा की जमीन खिसकती नजर आ रही है। वहीं मायावती को बढ़त मिलने के आसार है। ऐसे में कांग्रेस सपा और बीएसपी दोनों में से किसी की भी सवारी कर सकती है। लेकिन मायावती की नजर तो पीएम की कुर्सी पर है। वहीं मुलायम का कहना है कि नतीजे आने पर ही आगे की रणनीति बनाएंगे। यानी खेल अभी बाकी है। लेकिन मैदान तैयार है।
अगर बिहार में लालू-पासवान की बात करें तो दोनों की राजनीतिक जमीन पर नीतीश ने दस्तक दे दी है। दोनों दबी जुबान यूपीए के साथ होने की बात करते हैं पर कांग्रेस की नजर तो नीतीश पर है। गाहे-बगाहे सोनिया-राहुल नीतीश के बखान करते रहते हैं। लेकिन नीतीश ने एनडीए के साथ ही रहने का भरोसा दिलाया है। ऐसे में कांग्रेस के लिए वहां लालू-पासवान को साथ लेना एक मजबूरी है।
वैसे, लालू यादव यादव का कहना है कि मीडिया में जो दिखाया जा रहा है वो सच नहीं है। वो 16 मई के बाद ही पटना से दिल्ली आएंगे और अपना पत्ता खोलेंगे।
बिहार से हटकर पश्चिम बंगाल पर नजर डालें तो वहां कांग्रेस के साथ ममता बनर्जी है। अगर कांग्रेस वाम दलों को साथ लेता है तो ममता से किनारा करना होगा। लेकिन वाम दल कांग्रेस से खफा हैं। वहीं उड़ीसा में बीजेडी पर कांग्रेस की नजर है। लेकिन सारा खेल 16 मई को ही शुरू होगा। सबकुछ चुनावी नतीजे पर निर्भर करेगा। कांग्रेस के लिए एक बड़ी समस्या ये है कि किस पार्टी की सवारी कर नैय्या पार की जाए। क्योंकि ये तो जोड़तोड़ की राजनीति है।
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