पवित्र ‘गंगा’ को बचाना है
शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009
गंगा जीवन का दूसरा नाम है। दुनियाभर में ऐसी कोई नदी नहीं जो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को जिंदगी देती है। लेकिन गंगा की हालत खराब है। शहरों और उद्योगों के कूड़े करकट ने गंगा की रफ्तार थाम दी है। लेकिन अब सरकार को भी समझ आने लगा है। जिंदगी बचानी है तो गंगा को बचाना होगा।
केन्द्र सरकार ने मिशन क्लीन गंगा शुरू की है। इसके लिए नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी का गठन किया गया है। सरकार का दावा है कि साल 2020 तक गंगा को साफ कर लिया जाएगा। मिशन क्लीन गंगा में 400 करोड़ अमेरिकी डॉलर का खर्च आएगा। इसमें से 100 करोड़ डॉलर वर्ल्ड बैंक से मिलेगा।
बाइट- वर्ल्ड बैंक वाले की।
मिशन है कि अगले दस सालों में शहरों से कोई भी कचरा गंगा में न गिरे। लेकिन क्या हम सरकार के इस दावे पर भरोसा कर सकते हैं। मुश्किल है, क्योंकि इतिहास इसकी इज़ाजत नहीं देता। 1985 में शुरू हुए गंगा एक्शन प्लान के अंतर्गत अभी तक 1500 करोड़ रुपए से ज्यादा रुपए खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। अभी भी शहरों और उद्योगों का 45 फीसदी कचरा गंगा में गिरता है। ज़ाहिर है गंगा एक्शन प्लान का पैसा गंगा की जगह अफसरों और नेताओं की जेब में चला गया।
दरअसल मोक्ष की नगरी काशी। देश भर से ही नहीं बल्कि दुनिया भर से लोग मोक्ष की तलाश में बनारस आते हैं। घंटों गंगा मैय्या की जय-जयकार करते हैं। श्रद्धालुओं के लिए गंगा एक महज एक नदी नहीं बल्कि आस्था और विश्वास का प्रतीक है। लेकिन धर्म के रूप में बहने वाली गंगा मैली हो गई है।
25 साल पहले राजीव गांधी ने सेन्ट्रल गंगा कमेटी बनाई। जिसकी देख रेख में गंगा को दो चरणों में साफ करना था। पहले चरण में 261 योजनाएं बनीं जिसमें से 251 को पूरा माना गया। दूसरा चरण २२ सौ करोड़ रुपए में शुरू हुआ जिसमें 435 योजनाएं बनी। गंगा को साफ करने के लिए 1503 करोड़ रुपए पानी की तरह बहा दिए गए लेकिन गंगा मैली की मैली ही रही। लेकिन गंगा के नाम पर राजनीति करने वालों की दुकान खूब फली फूली।
कैग रिपोर्ट की मानें तो अब तक गंगा के नाम पर कई हजार करोड़ खर्च हो चुके हैं लेकिन गंगा की हालत बद से बदतर होती जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गंगा का पानी नहाने के लायक तक भी नहीं है। वाराणसी में रोजाना 22 करोड़ लीटर पानी सीवेज में जाता है। जबकि यहां के सीवेज केंद्र में महज 10 करोड़ लीटर पानी ही ट्रीट हो पाता है यानि 12 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में चला जाता है।
जाहिर है खतरे की घंटी बज चुकी है। अगर अब भी हम गंगा की सफाई को लेकर पहले जैसे लापरवाह बने रहे तो हालात काबू से बहार हो जाएंगे। देश की संस्कृति की प्रतीक गंगा को बचाने के लिए जरूरत है एक भागीरथी प्रयास की।
गंदगी होने के बाद भी आस्था लोगों को गंगा के तट तक खींच ही लाती है। धार्मिक रीति रिवाज के लिए लोगों को मजबूरन गंगा की शरण में आना पड़ता है। हरिद्वार दूर होने की वजह से दिल्ली और आसपास के लोग ब्रजघाट पर आने के लिए मजबूर हैं। सभी जानते हैं कि गंगा मैली है लेकिन मन में एक विश्वास है कि गंगा की गोद में गंदगी भी साफ हो जाती है।
