खून बहाने की अंधी परंपरा

सोमवार, 19 अक्टूबर 2009


आज भी देश के कई हिस्सों में अंधिवश्वास और परंपरा के नाम पर फैली कुरीतियों को भेद पाने में नाकाम हैं। इंदौर इलाके में होने वाला परंपरागत युद्ध बेहद पुराना है। ये युद्ध दो गुटों के बीच होती है और इसे देखने के लिए 20 से 25 हजार की भीड़ जमा होती है। इस युद्ध को शुरू होने से पहले सारे इंतजाम किए जाते हैं। ये खेल कब शुरू हुआ है खेलने वाले भी खुद नहीं जानते हैं।
इलाके में इसे हिंगोट युद्ध कहा जाता है। हर यौद्धा के थैले में 500 से ज्यादा हिंगोट होते हैं। हर साल इस युद्ध में कई लोग घायल होते हैं। इस युद्ध को लड़ने के लिए शराब से हौसले भरे जाते हैं। तभी तो सामने जोखिम होने के बावजूद सभी योद्धा बेखौफ नजर आते हैं।
दरअशल दीवाली के दूसरे दिन इंदौर के पास का गौतमपुरा गांव का मैदान जंग के मैदान में बदल जाता है। दोनों तरफ से दो गांवों के लोग एक-दूसरे के लहू के प्यासे हो जाते हैं। किसी को इस बात की फिक्र नहीं कि इस युद्ध में किसी की जान भी जा सकती है। और हर बार यहां काफी तादाद में लोग घायल होते हैं।
वहीं खतरों के इस खेल को देखने में भी जोखिम कम नहीं है। इस जोखिम की तैयारी बहुत पहले से शुरू हो जाती है।
जिस अग्निबाण से ये खेल खेला जाता है उसे हिंगोट कहते हैं। हिंगोरिया नाम के फल को सुखाकर उसमें बारूद भरा जाता है। उससे ये अग्निबाण हिंगोट तैयार होते हैं।

इस खेल में तुर्रा और कलंगी नाम की दो टीमें होती हैं। दोनों टीमें एक-दूसरे से दुश्मनों की तरह ही लड़ती हैं। हर साल दीवाली के एक दिन बाद ये खेल खेलने की परंपरा है। इस खेल का बाकायदा प्रचार किया जाता है। जाहिर है, अंधविश्वास का ये खेल प्रशासन की जानकारी में होता है। जिस खेल को रोकने के लिए प्रशासन को सख्ती करना चाहिए उसे बेरोकटोक जारी रखने के इंतजाम किए जाते हैं।

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