हर तीसरा भारतीय डिप्रेशन का शिकार
बुधवार, 27 जुलाई 2011विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक सर्वे कर ये जानने की कोशिश की कि वो कौन सा देश है जहां डिप्रेशन के सबसे ज्यादा मामले आते हैं। इस सर्वे के नतीजे बेहद ही चौंकाने वाले हैं। जी हां, दुनिया के कई विकसित और विकासशील देशों में भारत ही वो देश है जहां सबसे ज्यादा लोग डिप्रेशन का मरीज बन रहे हैं। डिप्रेशन एक ऐसी बीमारी है जो विकराल रूप ले ले तो कुछ भी हो सकता है। डिप्रेशन का शिकार मरीज अचानक पूरे समाज से कट जाता है और अगर वक्त पर इलाज नहीं मिला तो मरीज खुदकुशी तक कर लेता है। यूं तो डिप्रेशन दिमाग की एक दशा होती है, लेकिन अगर ये गंभीर रूप ले ले, तो इसे कहा जाता है MDE यानि मेजर डिप्रेसिव एपिसोड।
WHO ने ये सर्वे दुनिया भर के 18 देशों में किया। करीब 90 हजार लोगों का इंटरव्यू किया गया इनमें 36 फीसदी लोग भारत में MDE यानि मेजर डिप्रेसिव एपिसोड का शिकार हैं। दूसरे नंबर पर है फ्रांस। फ्रांस में 32.3 फीसदी लोग MDE के शिकार हैं। तीसरे नंबर पर है दुनिया का सबसे विकसित माना जाने वाला देश अमेरिका। यूएस में 30.9 फीसदी लोग डिप्रेशन के शिकार हैं। इस सूची में सबसे नीचे है चीन। जहां डिप्रेशन रेट है महज 12 फीसदी।
दुनिया भर में 121 मिलियन लोग डिप्रेशन का शिकार होते हैं। जिनमें से 8.5 लाख लोग डिप्रेशन के चलते अपनी जान तक दे देते हैं। बात करें भारत की तो सर्वे के मुताबिक आमतौर पर मिडल एज में ही लोग डिप्रेस रहते हैं। भारत में डिप्रेशन के शिकार लोगों की औसत उम्र 32 साल के आसपास है। इससे भी चौंकाने वाली बात ये है कि भारत में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा डिप्रेशन है। पुरुष और महिलाओं के बीच का 2:1 का अनुपात है। मतलब ये कि दो महिलाओं पर एक पुरुष को डिप्रेशन है। महिलाओं के डिप्रेस होने के पीछे बड़ा कारण है साथी। वजह चाहे तलाक हो, या फिर साथ छूट जाना, या फिर मौत।
भारत में लोग डिप्रेशन को एक उदासी की तरह ही देखते हैं और ऐसे में लोग डिप्रेशन के बारे में विशेषज्ञों से राय लेने से कतराते हैं जिसका नतीजा काफी घातक हो जाता है। डिप्रेशन एक डिसआर्डर है, जिसमें उदासी की भावना किसी इंसान को दो हफ्ते या इससे भी ज्यादा लंबे वक्त तक घेरे रहती है। इससे लाइफ में उसकी दिलचस्पी कम हो जाती है। उसमें निगेटिव फीलिंग्स भी आ जाती हैं। किसी काम के अच्छे नतीजे की उसे बिल्कुल आशा नहीं रहती।
डिप्रेशन में किसी भी इंसान को अपना एनर्जी लेवल लगातार घटता महसूस होता है। इस तरह की भावनाओं से वर्कप्लेस पर किसी भी इंसान की परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है। उसकी रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। इस तरह के डिप्रेशन को क्लिनिकल डिप्रेशन कहा जाता है।
डिप्रेशन के लक्षण :-
- लगातार उदासी से घिरे रहना
- बेचैनी महसूस करना
- चिड़चिड़ापन महसूस करना
- जिंदगी से कोई उम्मीद न होना
- हर वक्त जिंदगी को बोझ मानना
- मनपसंद काम से भी मन ऊबना
- शरीर में एनर्जी लेवल कम महसूस होना
- नींद न आना
- तड़के नींद खुल जाना
- भूख कम लगने से लगातार वजन गिरना
- मन में खुदकुशी जैसे बुरे ख्याल आना
ऐसा नहीं है कि डिप्रेशन सिर्फ पुरुषों या महिलाओं में होता है। बल्कि डिप्रेशन के शिकार आज की तारीख में बच्चे भी हो रहे हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों में डिप्रेशन का मामला लगातार ज्यादा देखा जा रहा है और यही वजह है कि बच्चों में सुसाइड की घटना पहले से बढ़ी हैं। बड़ी बात ये है कि बच्चों में डिप्रेशन के कारण बहुत छोटे-छोटे होते हैं। पैरेंट्स की उम्मीदों पर पढ़ाई में खरा न उतरना, घर में दो बच्चों की तुलना से किसी एक बच्चे में डिप्रेशन आ जाना, मां-बाप के आपसी संबंध ठीक न रहने से बच्चे में डिप्रेशन आ जाना।
सवाल उठता है कि डिप्रेशन को दूर कैसे भगाएं? डॉक्टरों के मुताबिक डिप्रेशन को खत्म करने का सबसे बड़ा हथियार है आत्मविश्वास। अगर आप आत्मविश्वास से भरपूर हैं तो ये मान कर चलें कि आप अपने आसपास को भी संतुष्ट रखेंगे। मतलब ये कि असंतोष डिप्रेशन का एक बड़ा कारण है। असंतोष की वजह से आपमें नकारात्मक सोच पनपेगी और यही धीरे-धीरे डिप्रेशन का रूप ले लेगा। इसलिए जरूरी है कि आप खुद का आत्मविश्वास बनाए रखें। एनर्जी लेवल कम न होने दें।
दूसरी सबसे बड़ी चीज है हर हाल में खुश रहना। डॉक्टर कहते हैं कि हर हाल में खुश रहिए क्योंकि खुशी ही हमारी सेहत का मूलमंत्र है। डिप्रेशन का सबसे बड़ा टॉनिक है खुशनुमा माहौल, अच्छी बातें, अच्छी किताबों का साथ और पॉजीटिव थिंकिंग।
डिप्रेशन से बचने का तीसरा बड़ा उपाय है अपने तौर-तरीकों में बदलाव। अपने काम करने के तरीके में छोटे-मोटे बदलाव। मतलब ये कि इस दौरान आप अपने अधूरे शौक को पूरा करने की कोशिश करें। टारगेट बनाएं और किसी काम को पूरा करने के छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित करें। ऐसा करने से डिप्रेशन नहीं होगा। छोटे-छोटे लक्ष्य पूरे होने पर आत्मविश्वास बढ़ता रहेगा और तनाव पास नहीं आएगा।
इसके अलावा अगर फिर भी आपका डिप्रेशन खत्म नहीं हो रहा हो, तो फौरन डॉक्टर से मिलें। डॉक्टरों की तरफ से दी जाने वाली थेरेपी और दवाओं का इस्तेमाल करें। लेकिन इस बात का ख्याल रखें कि आपका डिप्रेशन लंबे समय तक कायम न रहे नहीं तो ये घातक भी साबित हो सकता है।
ऐश्वर्या मां बनने वाली हैं, अमिताभ बेहद
मंगलवार, 21 जून 2011बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन के आंगन में किलकारियां गूंजने वाली है1 ऐश्वर्या राय बच्चन मां बनने वाली हैं। खुद अमिताभ ने सोशल नेटवर्किंग साइट टि्वटर पर ये खुशखबरी दी है। बिग बी ने ट्वीट किया है कि वो दादा बनने वाले हैं।
अमिताभ बच्चन ने अपने ट्वीट में लिखा है कि ‘मैं जल्द दादा बनने वाला हूं। ऐश्वर्या मां बनने वाली हैं। मैं बेहद खुश हूं।‘
मालूम हो कि इससे पहले कई बार अमिताभ से उनके चाहने वाले पूछते थे कि आप दादा कब बनेंगे। इसके जवाब में अमिताभ ने कहा करते थे कि जब ये खुशी का लम्हा आएगा तो वो अपने चाहने वालों से जरूर शेयर करेंगे और आज उन्होंने अपने चाहने वालों को ये खुशखबरी दे दी है।
अभी ऐश्वर्या और अभिषेक ने इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। लोगों को इंतजार है कि अब खुद ऐश्वर्या और अभिषेक इस खुशखबरी के बारे में अपने चाहने वालों को बताएं।
मुबारक के बाद अब मिस्र का क्या होगा?
शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011मिस्र में 18 दिनों के सत्ता विरोधी प्रदर्शन के बाद आखिरकार राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक ने अपना पद छोड़ दिया है और देश की सत्ता सेना के हाथों में सौंप दी है। मुल्क के उपराष्ट्रपति उमर सुलेमान ने शुक्रवार को टीवी पर दिए गए बयान में इसका ऐलान किया। इस खबर के फैलते ही मिस्र में जश्न शुरू हो गया है। काहिरा में मौजूद लाखों प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाकर, झंडे फहराकर और कारों का हॉर्न बजाकर अपनी खुशी का इजाहर किया।
मुबारक का राष्ट्रपति पद छोड़ना मिस्र की जनता की पहली जीत है । लेकिन लोकतंत्र की इस लड़ाई में आगे और कई पड़ाव हैं और चुनौतियां भी। साथ ही मध्यपूर्व के दूसरे देशों के लिए भी ये क्रांति एक आइना है।
मिस्र की जनता ने पहली जीत तो जीत लिया है, लेकिन स्याह अतीत और सुनहरे वर्तमान के बाद सुखद भविष्य की गारंटी अभी भी नहीं। मुबारक तो चले गए। लेकिन इसके बाद क्या होगा? क्योंकि मुबारक अपने पीछे छोड़ गए हैं एक ऐसा तंत्र जिसकी कमान फौज के हाथ में है। ऐसे में पांच सवाल उभर कर आ रहे हैं।
1. क्या फौज संविधान संशोधन और राजनीतिक सुधार की प्रकिया को आगे लेकर जाएगी?
2. क्या लोकतांत्रिक संस्थानों को बल मिलेगा,
3. क्या देश में जल्द निष्पक्ष चुनाव कराए जाएंगे,
4. क्या सत्ता की कमान किसी लोकप्रिय चेहरे के हाथों होगी?
4. कहीं नासेर, सदात और मुबारक की तरह कोई फौजी ही तो आगे चलकर राषट्रपति और फिर तानाशाह तो नहीं बन जाएगा?
लोग तमाम तरह के कयास लगा रहे हैं। जानकारों की मानें तो एक तरीका ये है कि लोकतंत्र समर्थक नेता अल बरदेई, एल घाद पार्टी के एयमन नूर या फिर कोई आम आंदोलनकारी को मुल्क की अगुवाई करने का मौका दिया जाए। लेकिन ये सब इस पर निर्भर करेगा कि सत्ता हस्तांतरण को लेकर अलकायदा और इस्लामिक कटटरपंथ के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका अपने अहम सहयोगी मिस्र पर किस तरह का दबाव बनाता है।
जानकारों के मुताबिक मुमकिन है कि किसी राष्ट्रीय एकता गठबंधन की अंतरिम सरकार बने। साथ ही राष्ट्रपति पद के कार्यकाल और संविधान संशोधन को तय करने के लिए जनमत संग्रह भी हो।
लेकिन सवाल ये भी है कि उपराष्ट्रपति और 30 साल से मुबारक की परछाई रहे उमर सुलेमान की क्या भूमिका रहेगी? मुबारक के सिक्रेट सर्विस के लंबे समय तक मुखिया रहे सुलेमान अपने अमानवीय हथकंडो की वजह से भी चर्चा में रहे हैं। सीआईए के नज़दीकी सहयोगी रहे सुलेमान क्या सत्ता पर दावा करेंगे? कहीं मिस्र बांग्लादेश, बर्मा और पाकिस्तान की तरह सैन्य सरकार के फंदे में तो नहीं फंस जाएगा?
अमेरिका को इस बात की भी चिंता है कि अब मुबारक के जाने के बाद कहीं पूरे क्षेत्र में अमेरिका और इजरायल विरोधी भावनाओं को बल ना मिले। अमेरिका मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे इस्लामिक संगठन के हाथ में सत्ता पसंद नहीं करेगा। मिस्र को फिलहाल एक सवाल का जवाब जरूर मिल गया है। लेकिन अभी कई और सवालों का जवाब ढूंढना है।
इस साल गर्मी निकालेगी तेल, बारिश बिगाड़ेगी खेल
शुक्रवार, 28 जनवरी 2011आनेवाले सालों में हरियाली भारत के नक्शे से गायब हो सकती है। हिंदुस्तान रेगिस्तान बन सकता है। ये एक ऐसी हकीकत जो बेहद कड़वी है। वैज्ञानिकों ने भारत पर मंडरा रहे खतरे की तरफ इशारा किया है और कहा कि ये डरावना सच 2050 तक हकीकत में तब्दील हो सकता है। पुणे की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल एंड मेटेरेयोलॉजिकल रिसर्च की एक स्टडी तो यही बता रही है।
ये संस्था भारत में जलवायु परिवर्तन पर नजर रखनेवाली जानीमानी सरकारी संस्थानों में से एक है। इसके तीन वैज्ञानिकों ने अमेरिका, फ्रांस और थाइलैंड के मौसम वैज्ञानिकों के साथ भारत में बदलते तापमान पर शोध किया। नतीजे चौंकाने और डराने वाले हैं। रिसर्च के नतीजों के मुताबिक सदी के अंत तक भारत में तापमान 6 डिग्री तक बढ़ जाएगा। अगले 30-40 साल में तापमान में करीब 4 डिग्री का इजाफा होगा। दिन का न्यूनतम तापमान बढ़ता जाएगा। गर्मियों में रात का तापमान भी दिन की झुलसा देनेवाली तपिश के बराबर होगा। गर्मी का मौसम और लंबा हो जाएगा। यानि हरियाली धीरे-धीरे रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगी।
जरा सोचिए कि 50 डिग्री के पार पारा चला गया तो क्या हाल होगा। आपका एयरकंडीशनर तक नकारा हो जाएगा। कूलर का पानी भी खौल उठेगा। बाहर निकलेंगे तो चेहरा झुलस जाएगा।
इन सबकी वजह ग्लोबल वॉर्मिंग है। कारखानों और गाड़ियों के धुएं से फैलता बेकाबू प्रदूषण, जिसके चलते ग्रीन हाउस के प्रभाव से निकलने वाली गैस बेकाबू होती जा रही है। धड़ाधड़ काटे जा रहे पेड़ और इन सबके चलते कुदरत में बदलाव होता जा रहा है।
रिसर्च के मुताबिक पहले तो तापमान 2 डिग्री से 3.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ेगा और फिर ये वजहें इसे और फैलने का मौका दे देंगी। इसकी बानगी है साल 2009 में भारत में पड़ी बेतहाशा गर्मी। आधिकारिक तौर पर 2009 भारत का अबतक का सबसे गर्म साल रहा है और 2009 में तापमान बाकी सालों के मुकाबले 1 डिग्री सेल्सियस ज्यादा बढ़ गया।
मौसम विभाग के मुताबिक जब गर्मी को लेकर भारत में पिछले 108 सालों का रिकॉर्ड देखा गया तो ये पता चला कि इस दौरान गिने गए कुल 12 सबसे गर्म सालों में से 8 साल सिर्फ साल 1999 से 2009 तक के बीच में थे। यानि पिछले 10 सालों में ही गर्मी ने 108 साल के रिकॉर्ड को धराशाई कर दिया। वहीं पिछले साल यानि 2010 में दुनिया भर में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने लोगों को बेहाल करके रख दिया।
वहीं दूसरी तरफ IITM पुणे के वैज्ञानिकों की मानें तो एक तरफ जब तेजी गर्मी का कहर कम होगा तो दूसरी तरफ बारिश कहर बरपाएगा। IITM पुणे की रिसर्च में कुछ ऐसे ही भयंकर तथ्य सामने आए हैं। वैज्ञानिकों की टीम ने इस रिसर्च के जरिए जो आंकड़े हासिल किए हैं। उसके मुताबिक भारत में सालाना औसत बारिश में 8-10 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन बारिश के मामले में समस्या इसके सालाना औसत से नहीं, बल्कि इसकी रफ्तार और मॉनसून की टाइमिंग से है। ऐसे में बारिश हद से ज्यादा मूसलाधार और भारी होगी।
मॉनसून के दिनों में हद से ज्यादा बारिश होने से खेती को काफी नुकसान होगा। मई और अक्टूबर के बीच में होनेवाली बारिश करीब 20 फीसदी तक बढ़ जाएगी। इसकी वजह से करीब 20 फीसदी फसल बर्बाद हो जाएगी। चारों तरफ बाढ़ और बादल फटने का खतरा मंडराने लगेगा। दिल्ली और आसपास न्यूनतम तापमान 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा।
गौरतलब है कि 5 अगस्त 2010 को लेह में एकाएक बादल फटने से 100 से ज्यादा लोग मौत के आगोश में चले गए। IITM पुणे के मुताबिक मॉनसून के दौरान तापमान में अचानक आई बढ़ोतरी भी लेह त्रासदी की वजह बनी। ये इशारा था कि कुदरत अपने साथ हो रहे खिलवाड़ से किस कदर गुस्से में है। ये सबूत था कि ग्लोबल वॉर्मिग का नतीजा कितना खतरनाक हो सकता है।
इसके बाद नए साल 2011 की शुरुआत में ही ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया में आई भयानक बाढ़। अकेले ब्राजील में ही करीब 700 लोग बाढ़ की चपेट में आकर मारे गए। रिसर्च में जो दावे किए गए उससे तो यही लगता है कि हिंदुस्तान के नक्शे पर एक मौसम में सिर्फ रेत होगी तो दूसरे मौसम में सिर्फ पानी होगा।
नीतीश की जीत में कोई रहस्य नहीं..लालू जी!
शुक्रवार, 26 नवंबर 2010बार-बार दोहराया जाता है कि बिहार के इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता, देश के विकास में बिहार का अहम योगदान रहा है, कई ऐसे महापुरुष थे, जो थे तो बिहार के लेकिन उनकी पहचान बिहार तक ही सीमित नहीं थी। जब भी इतिहास की बात होती तो उनके चर्चे जरूर होते हैं। लेकिन वर्तमान में बिहार और बिहार के लोग अपनी पहचान इतिहास में दर्ज कराने में असफल रहे, या फिर वो उस लायक साबित ही नहीं हुए कि उनका नाम और उनके काम को सराहा जाए।
लेकिन बिहार में 24 अक्टूबर को एक युग का अंत हो गया और उसके साथ ही दूसरे युग ने स्वर्णिम दस्तक दे दी है। भले ही इसे इतिहास के पन्नों में अपनी जगह बनाने में अभी वक्त और लगे, लेकिन ऐतिहासिक तो शुरू के दिनों से ही हो गया। सीधे लफ्जों में कहें तो नीतीश ने एक युग का अंत कर दिया है और दूसरे युग में ऐतिहासिक कदम रख दिया है।
जी हां, बिहार चुनाव में नीतीश कुमार ने जो फतह हासिल की है उससे उन्हें ऐतिहासिक विकासपुरुष तो बना ही दिया है। भले ही उनकी इस कामयाबी को इतिहास के पन्नों में तुरंत जगह नहीं मिले। नीतीश ने दिखा दिया कि विकास की पूजा होती है। लोग अब जाति-पाति से ऊपर उठकर सोचने लगे हैं। बीजेपी-जेडीयू गठबंधन ने पिछले 5 सालों में बिहार को एक नई दिशा देने की कोशिश की, जो अपने राह से भटक गई थी।
नीतीश ने लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को जानने की कोशिश की, भले ही उन समस्याओं का समुचित समाधान नहीं हुआ हो, लेकिन लोगों में नीतीश के प्रति विश्वास जगा, लोगों में संदेश गया कि ये नेता हमारे लिए ईमानदारी से कोशिश कर रहा है इसे एक और मौका देना चाहिए। वैसे भी नीतीश चुनावी सभाओं में एक ही बात कहते थे...'जिसने बिहार को बदहाल किया उसे आपने 15 साल दिया और मैं संवारने की कोशिश कर रहा हूं तो मुझे केवल 5 साल ही देंगे'... इस जुमले के बाद सीधे नीतीश कहते थे कि मुझे 5 साल और दीजिए ताकि आपसे किए वादे को पूरी तरह से पूरा कर पाऊं।
लोगों ने भी सोचा चल जब 15 साल तक अपनी बिरादरी या फिर जिसने कोई वादा ही नहीं किया, उन्हें हमने दिया तो फिर इसने तो कुछ किया है और बहुत कुछ करने का हाथ जोड़कर वादा भी कर रहा है। तो क्यों न एक मौका इसे और दिया जाए? मानो इसी बात के साथ बिहार की जनता ने अगल-बगल झांकने के बजाय एकमुश्त जाति-पाति, हिन्दु-मुस्लिम से ऊपर उठकर नीतीश के कंधों पर अपना हाथ रख दिया।
बिहार में इस बीजेपी-जेडीयू की ऐतिहासिक जीत ने अपने पीछे कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कुछ के जवाब आने में सालों लग जाएंगे लेकिन कुछ के जवाब तो बीजेपी-जेडीयू गठबंधन के 200 के आंकड़े को पार करते ही तलाश जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि क्या लालू युग का अंत हो गया है? अभी लालू 67 साल हैं ऐसे में अगले बिहार चुनाव तक वो 72 के हो जाएंगे, क्या लालू 72 की उम्र में एक बार फिर कोई करिश्मा कर देंगे।
ये सवाल इसलिए उठ रहा है कि बिहार में सबसे ज्यादा युवाओं की तादाद है ऐसे में 72 साल लालू युवाओं को किस तरह अपनी और लुभाएंगे, क्योंकि हर ओर युवा नेता को आगे लाने और उसे कमान सौंपने की बातें चरम पर हैं। तो क्या इस हार के साथ ही बिहार में लालू युग का अंत हो गया है? या फिर लालू अपने बेटे के हाथ में पार्टी का कमान सौंपेंगे, क्योंकि इसका आगाज लालू ने इस चुनाव में कर दिया है। जो भी हो अभी तो लालू को 5 साल की फिर कठोर बनवास मिल ही गया है।
एक और सवाल ये है कि अब पासवान का क्या होगा? क्योंकि वो तो अभी युवा हैं लेकिन करिश्मा नहीं दिखा पा रहे हैं या फिर लोगों ने उन्हें तरजीह ही नहीं देना चाहते। क्या इन्हें भी अब ऐहसास होगा कि अब जिस दलित वोटरों के बल पर वो राज करते आए थे अब पराए हो गए हैं या फिर उसने विकास का स्वाद चखकर नीतीश के पाले में अपनी जगह बना ली। जिसमें सेंधमारी फिलहाल मुमकिन नहीं है।
लालू-पासवान को अपनी हार से ज्यादा एनडीए की जीत रहस्यमय लग रही है। वो इस रहस्य से पर्दा उठाने की बात कर रहे हैं। लेकिन वो भी जानते हैं कि भूखी-प्यासी जनता को नीतीश की आधी रोटी मिल गई थी और वो अब पूरी रोटी खाना चाहती है, इसलिए उनका दामन छोड़ दिया। शायद इस कदर हार की उम्मीद तो जनता ने भी नहीं की होगी तो लालू-पासवान को तुरंत कैसे हजम हो जाएगी। वक्त के साथ सबकुछ ठीक हो जाएगा।
वहीं बिहार में अपनी अस्तित्व को तलाश रही कांग्रेस को फिर मुंह की खानी पड़ी है। राहुल बाबा का जादू बिहार के लिए फ्लॉप शो साबित हुआ, सबने नीतीश को कोसा, लेकिन बिहार की जनता ने तो उनकी बातों को सुनी लेकिन अपने फैसले पर अडिग रही।
आखिर में मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं नीतीश ने केवल ऐतिहासिक जीत ही नहीं हासिल की है, ये भी दिखा दिया कि विकास के नाम पर चुनाव जीते भी जाते हैं और वो भी रिकॉर्ड बहुमत के साथ। उन्होंने उन नेताओं और पार्टियों को संदेश भी दे दिया जब बिहार के लोग जाति-पाति से उठकर मतदान कर सकते हैं तो देश के बाकी के हिस्सों में भी इसे दोहराया जा सकता है। बस नेताओं को ईमानदारी से कोशिश करने की जरूरत है। साफ शब्दों में कहें तो नीतीश की जीत ने राजनीति की नई परिभाषा गढ़ दी है।
बिहार, विकास, बिरादर...और वोट
सोमवार, 18 अक्टूबर 2010विकास तो हुआ है लेकिन उस पैमाने तक नहीं, ताकि वोट बिरादर पर हावी हो। विकास की हवा तो है लेकिन लहर पैदा नहीं हो पाई। वोटर से लेकर नेताजी तक पूरे कंफ्यूज हैं। चुनावी एजेंडा बन ही नहीं पाया। कुल मिलाकर नीतीश अंधेरे में तीर मारने की पूरी जुगत में लगे हैं तो लालू जी तेज आंधी में लालटेन के सहारे नए रास्ते तलाश रहे हैं। यानि बिहार में खिचड़ी चुनाव की तैयारी हो चुकी है।
पांच साल पहले जैसे ही नीतीश की सरकार सत्ता में आई तो 90 दिन के अंदर के कानून-व्यवस्था दुरुस्त करने क बात कही गई, कुछ हद अपराध पर लगाम भी लगे लेकिन समयसीमा फेल हो गई। लालू जी का जंगल राज खत्म हो गया था, एक नए सबेरे के साथ बिहार की फिजाएं बदलने लगी थी। जेपी आंदोलन के दो सिपाही आमने-सामने थे, टक्कर अब भी कांटे की थी। क्योंकि लालू जी ताकत अब भी कम नहीं हुई थी वो रेल पर सवार होकर बिहार की राजनीति कर रहे थे तो नीतीश बिहार को संवारने में लगे थे।
बिहार में जंगलराज स्थापित करने के नाम से बदनाम लालू को रेलवे में इस कदर कामयाबी मिली कि वो आईआईएम से लेकर हॉवर्ड यूनिवर्सिटी तक स्टूडेंटों को मैनेजमेंट का गुर सिखाने लगे। घाटे में चल रहे रेलवे मुनाफे की पटरी पर तेज रफ्तार से दौड़ने लगा। लेकिन बदनामी के दाग धोने के लिए ये काफी नहीं था। लोकसभा चुनाव में नीतीश ने कुछ दिन की सरकार की उपलब्धियों को भुनाते हुए बिहार से लालू राज का खात्मा ही कर दिया। जिस बल पर वो रेल पर काबिज थे, वो ताकत क्षणभर में गायब हो गई। नीतीश ने इस कदर सटीक निशाने पर तीर साधा कि लालू जी के लालटेन की लौ दिखाई ही नहीं देखने लगी। लालू की हर चुनावी दांव फेल हो गया, वोटिंग मशीन दबाने से लेकर चुनावी सभा में चुटकी लेते हुए खैनी मांग कर खाने का शिगूफा वोटरों का खूब मनोरंजन किया, वोटरों ने भी लालू जी से वोटिंग मशीने दबाने का तरकीब तो सीख लिए लेकिन जब दबाने की बारी आई तो वोटरों ने लालटेन नहीं तीर को चुना। लेकिन तब भी लालू हार मानने वाले नहीं थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था उनका हर दांव फेल हो रहा है और लोगों ने उन्हें नकार दिया है, भला विश्वास हो भी तो कैसे? 15 साल से लालू अपने अंदाज में राज कर रहे थे, जब खुद पर घोटाले का साया आया तो धर्मपत्नी को रातोंरात गद्दी पर बिठा दिया। लालू जी ने प्रदेश में एक जमीन तैयार की थी जिसे उन्हें इतनी जल्दी खोने की उम्मीद नहीं थी।
वहीं नीतीश बिना किसी खींचतान के 5 साल तक बिहार में बने रहे। लालू के हमले से बेपरवाह नीतीश पर इस बीच अपनों ने ही कई हमले किए। पार्टी के कई नेताओं ने नीतीश सरकार के खिलाफ बगावती तेवर अपना लिया, सड़क से लेकर विधानसभा तक नीतीश का विरोध हुआ लेकिन नीतीश टस से मस नहीं हुए। जिसने भी नीतीश पर निशाना साधा उसके पर कतर दिए गए या फिर उन्हें पार्टी में इस कदर अलग-थलग कर दिया गया कि वे खुद दूसरे के हाथ थाम लिए या फिर पंगू बन कर रह गए। एक समय नीतीश के दाहिने हाथ कहे जाने वाले लल्लन सिंह भी नीतीश पर दबाव बनाने के लिए कई हथकंडे अपनाए, लेकिन नीतीश की बिछाए बिसात में वो उलझ कर रह गए। नीतीश अब तक अपनी पहचान विकासपुरूष के रूप में बना चुके थे। आर्थिक जानकार भी बिहार और नीतीश की वाहवाही करने लगे, सारे आंकड़े नीतीश के पक्ष में थे। कामयाबी का श्रेय बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की सरकार से ज्यादा नीतीश को मिलने लगा। सबपर भारी नीतीश की रणनीति पड़ी।
लोगों में चर्चा का विषय गठबंधन सरकार की कामयाबी नहीं विकासपुरूष नीतीश की होने लगी। मैं भी बिहार का रहने वाला हूं लालू युग के करीब सालभर बाद जब बिहार गया तो फिजाएं बदली हुई थी, सोचे थे कि स्टेशन से उतकर घर जाने में ढाई से तीन घंटे तो लगेंगे ही लेकिन सफर इतना आसान था कि महज एक घंटे में ही घर के दरवाजे पर दस्तक दे दी। बिहार में हेमामालिनी के गाल जैसी सड़क बनाने की बात करने वाले लालू जी ना सही, नीतीश ने वो कर दिखाया। सड़कों पर महानगरों की तरह गाड़ियां दौड़ती नजर आईं। जहां लोग हिचकोले के आदी हो गए थे। नीतीश के विकास का वादा सड़क पर पूरे रंग में दिखा, लेकिन शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए।
आज नीतीश अपना कार्यकाल पूरा कर चुके हैं फिर मैदान में हैं लेकिन कंफ्यूज हैं। राजनीतिक समीकरण बिगड़ा हुआ है केवल विकास के एजेंडे के साथ नैय्या पार लगना मुश्किल लगता है। पिछले चुनाव के तरह बदलाव के भी बयार नहीं है। जाति समीकरण फिर हावी है। सालों पहले अपनों ने जो बगावत किया था वो आज ताल ठोंक रहे हैं, चुनौती दे रहे हैं कि देखते हैं कि किसमें कितना है दम, खास बात ये है कि वो अलग-अलग जाति से हैं। और वो ही नीतीश को सत्ता से बेदखल करने में लगे हैं। इस बीच लालू और पासवान एक होकर नीतीश पर निशाना साध रहे हैं, एक साथ नीतीश पर कई हमले हो रहे हैं। विपक्ष विकास के दावे को खोखला करार दे रहा है और जनता से एक मौका मांग रहा है। भले ही लालू की ताकत कम हो गई हो लेकिन राजनीतिक अनुभव तो आज भी उनके साथ है। अगड़ी जाति को दुत्कारने वाले लालू का अब नारा ही बदल गया है। एक समय ‘भूरा बाल साफ करो’ का नारा देने वाले लालू अगड़ी जाति को अब 10 फीसदी आरक्षण देने की बात कह रहे हैं। यही नहीं, बिहार को रेलवे की तरह एक नई पहचान देने का वादा कर रहे हैं।
लेकिन इन सबके बीच अब भी नीतीश की फुफकार कम नहीं हुई है भले ही कंफ्यूज हैं लेकिन विकास को ही वो प्राथमिकता दे रहे हैं। बीजेपी अब भी नीतीश की पीछे-पीछे जी-हुजुरी कर रही है। बीजेपी के स्टार प्रचारक मोदी और बरुण गांधी को चुनावी समर में नीतीश की नो एंट्री के आगे बीजेपी भी नतमस्तक हो गई है। सभी दल चुनाव प्रचार में अपनी सारी ताकत झोंक दी है, हर दिन कई रैलियां हो रही हैं। अगर नीतीश विकास के दम अपनी नैय्या पार लगा लेते हैं तो निश्चित ही उनका कद गठबंधन से बड़ा हो जाएगा, अगर असफल हुए तो लालू की वापसी होगी। परंतु एक बात तो साफ है कि अब लोग मसकरी नहीं विकास को देखकर वोट डालने लगे हैं, राज्य का एक बड़ा तबका विकास का रास्ता चुन चुका है। जो भी हो बिहार में जिसकी भी सरकार बने, उसे काम करके दिखाना होगा, क्योंकि बिहार में विकास की तेज लहर न सही, हवा तो चल ही चुकी है...।
टाइटैनिक जहाज के डूबने का खुला राज
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010कई मंजिला जहाज समुंद्र में डूब गया और साथ में दे गया जलसमाधि 1517 लोगों को। टाइटैनिक डूबने के करीब 100 साल बाद इस त्रासदी का सच सामने आया है। टाइटैनिक पर छपी नई किताब में दावा किया गया है कि जहाज के डूबने के लिए दुर्घटना नहीं बल्कि चालक दल की गलती जिम्मेदार थी। यही नहीं, किताब के मुताबिक हिमखंड यानि आईसबर्ग से टक्कर के बाद भी जहाज पर सवार यात्रियों की जान बचाई जा सकती थी।
अब तक यही माना जाता रहा है कि 14 अप्रैल 1912 को दुर्घटना के वक्त टाइटैनिक जहाज तेज गति से चल रहा था और चालक दल हिमखंड को देख नहीं पाया और इसी हिमखंड से टकराकर जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। लेकिन टाइटैनिक डूबने की असली वजह यह नहीं थी बल्कि टाइटैनिक का डूबना चालक दल की गलती का नतीजा था।
ये खुलासा टाइटैनिक के बारे में छपी 'गुड एज गोल्ड' नाम की नई किताब में किया गया है। इस किताब में दावा किया गया है कि चालक दल चाहता तो इस भयानक त्रासदी को टाला जा सकता था। द टेलिग्राफ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक इस घटना के सौ साल बाद इस पुस्तक में कहा गया है कि हिमखंड को देखने के बाद चालक दल के पास काफी समय था और वे टाइटैनिक को उससे टकराने से बचा सकते थे। लेकिन वे इस कदर भयभीत हो गए कि जहाज को उन्होंने उसी दिशा में मोड़ दिया। जब तक गलती का पता चलता तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
दरअसल दुनिया का सबसे बड़ा जहाज टाइटैनिक 10 अप्रैल 1912 को साउथंपटन से न्यूयॉर्क के लिए अपनी पहली यात्रा पर निकला था लेकिन चालक दल की गलती की वजह से समंदर में समा गया। टाइटैनिक को अभेद्ध समझा जाता था, कहा जाता था कि ये जहाज कभी डूब नहीं सकता। टाइटैनिक पर दो तरह के स्टियरिंग सिस्टम काम कर रहे थे। जहाज पर मौजूद चालक दल के कुछ सदस्यों को एक सिस्टम की जानकारी थी तो बाकी को दूसरे सिस्टम की। लेकिन अचानक इन दोनों सिस्टम के बीच तालमेल टूट गया और हिमखंड से टक्कर के बाद दोनों सिस्टम के चालक दल अलग-अलग दिशा में काम करने लगे और टाइटैनिक समंदर के आगोश में समा गया।
लुईस पैटन के मुताबिक उनके दादा लाइटोलर को इस गलती का एहसास हो गया था। जहाज डूबने से पहले उन्होंने चार वरिष्ठ अधिकारियों के साथ फर्स्ट ऑफिसर्स केबिन में एक अंतिम बैठक भी की थी। इस बैठक में जहाज को डूबने से बचाने की हर कोशिश पर चर्चा हुई। लुईस पैटन ने अपनी किताब में यह भी दावा किया है कि टक्कर के बाद यात्रियों को डूबने से बचाया जा सकता था अगर जहाज को टक्कर के बाद उल्टी दिशा में न चलाकर वहीं स्थिर खड़ा कर दिया जाता।
दरअसल टाइटैनिक बनाने वाली कंपनी व्हाइट स्टार लाइन के चेयरमैन ने टक्कर के बाद भी कैप्टन से जहाज को धीमी गति से आगे चलाते रहने की जिद की। करीब दस मिनट तक चलने के बाद जहाज की पेंद में घुस रहे पानी का दबाव बढ़ गया जिसकी वजह से टाइटैनिक जल्दी डूब गया। अगर जहाज को टक्कर के बाद पानी में स्थिर खड़ा रखा जाता तो ये कई घंटों बाद पानी में डूबता जिससे चार घंटे की दूरी पर खड़े दूसरे जहाज से मदद मिल सकती थी और हादसे का शिकार हुए 1517 लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
लुईस पैटन के मुताबिक उनके दादा ने ये राज सिर्फ अपनी पत्नी को बताया था। दादी ने यही राज अपनी पोती पैटन के सामने उजागर कर दिया। हालांकि उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा कि वो ये राज अपने सीने में ही दफन रखे। लेकिन दादी की मौत के 40 साल बाद पैटन को लगा कि टाइटैनिक जल त्रासदी से जुड़ा ये राज अब सिर्फ उन्हीं तक सीमित ना रहे बल्कि दुनिया को भी पता चले की टाइटेनिक डूबने की असली वजह हादसा नहीं, बल्कि एक गलती थी।
माइकल जैक्सन बने CNN म्यूजिक आइकन
गुरुवार, 26 अगस्त 2010माइकल जैक्सन को दुनिया भर के लोगों ने सबसे चहेता सिंगर बनाया है। सीएनएन की एक पोल में दुनियाभर के 20 गायकों को चुना गया था, जिसमें आशा भोसले का भी नाम था। लेकिन आखिरी 5 में आशा ताई अपनी जगह नहीं बना पाईं। सीएनएन के पोल में दुनिया भर से करीब 1 लाख लोगों ने वोट किया।
टॉप 5 गायकों की सूची इस तरह से है। नंबर वन पर रहे किंग ऑफ पॉप माइकल जैक्सन, जिनकी पिछले साल जून में अचानक मृत्यु हो गई थी। दूसरे नंबर पर मशहूर ब्रिटिश बैंड बीटल्स, तीसरे स्थान पर लेसली, चौथे पायदान पर एलविस प्रेसली और पांचवें स्थान पर बॉब मार्ले रहे। हालांकि टॉप 5 में किसी महिला सिंगर को जगह नहीं मिली। मडोना कुछ वोट से छठे स्थान पर रहीं।
पॉप की दुनिया के बेताज बादशाह माइकल जैक्सन, जिनसे डांस स्टाइल का हर कोई दीवाना है। जैक्सन को दुनिया का सबसे कामयाब गायक माना जाता है। उन्होंने करीब चालीस साल तक पॉप की दुनिया पर राज किया। जैको का नाम कई बार गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में लिखा जा चुका है। उन्होंने सबसे ज्यादा 13 बार ग्रैमी अवॉर्ड भी जीता। यही वजह है कि माइकल की मौत के बाद भी वो चाहने वालों के दिलों में जिंदा हैं।
घटिया प्रदर्शन जारी, भारत टी-20 वर्ल्ड कप से बाहर
रविवार, 9 मई 2010टीम इंडिया का वर्ल्ड कप में शर्मनाक प्रदर्शन जारी है। ऑस्ट्रेलिया से हारने के बाद टीम इंडिया अब वेस्टइंडीज से भी हार गई। यानी टीम इंडिया 2010 टी-20 वर्ल्ड कप से बाहर हो चुकी है। अब कोई करिश्मा ही भारत को सेमीफाइनल की दौड़ में वापस ला सकती है। वेस्टइडीज के खिलाफ 170 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी टीम इंडिया सिर्फ 155 रन ही बना पाई। वेस्टइंडीज के खिलाफ मैच में एक भी भारतीय बल्लेबाज नहीं चला।
किंग्सटन ओवल में रविवार को खेले गए ट्वेंटी-20 विश्व कप के सुपर-8 मुकाबले में वेस्टइंडीज ने भारत को 14 रनों से हरा दिया।
वेस्टइंडीज द्वारा पेश किए गए 170 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारतीय टीम 20 ओवरों में नौ विकेट पर 155 रन ही बना सकी।
भारत की तरफ से सुरेश रैना सबसे ज्यादा 32 रन बनाकर आउट हुए। वहीं, मुरली विजय सात, गौतम गंभीर 15, रोहित शर्मा पांच, युवराज सिंह 12, यूसुफ पठान 17, महेंद्र सिंह धौनी 29, हरभजन सिंह 14 और आशीष नेहरा शून्य बनाकर पेवेलियन लौट गए।
वेस्टइंडीज की तरफ से केमर रॉच ने दो विकेट लिए। इसके अलावा डरेन सैमी, जेरोम टेलर, ड्वेन ब्रावो, कीरोन पोलार्ड, क्रिस गेल और सुलेमान बेन ने एक-एक खिलाड़ी को आउट किया।
टॉस हारने के बाद पहले बल्लेबाजी करते हुए वेस्टइंडीज ने निर्धारित 20 ओवरों में छह विकेट के नुकसान पर 169 रन बनाए।
वेस्टइंडीज की तरफ से कप्तान क्रिस गेल ने सबसे ज्यादा 98 रन बनाए। उन्होंने 66 गेंदों का सामना करते हुए पांच चौके और सात छक्के लगाए लेकिन शतक बनाने से चूक गए।
टीम का पहला विकेट 80 रन के स्कोर पर शिवनारायण चंद्रपाल के रूप में गिरा। चंद्रपाल 29 गेंद पर 23 रन बनाकर नेहरा की गेंद पर आउट हुए। धौनी को कैच थमाने से पहले उन्होंने अपनी पारी में दो चौके लगाए। इसके बाद 119 के स्कोर पर सैमी आउट हुए। उन्होंने 10 गेंद पर 19 रन बनाए जिसमें दो चौके और एक छक्का शामिल था।
वेस्टइंडीज को तीसरा झटका 160 रन के स्कोर पर लगा जब कीरोन पोलार्ड 11 गेंद पर 17 रन बनाकर आउट हुए इस पारी में उन्होंने दो छक्के लगाए। अंतिम ओवर में वेस्टइंडीज का चौथा विकेट 163 रन के स्कोर पर गिरा जब ड्वेन ब्राओ एक रन बनाकर आउट हुए।
पांचवें विकेट के रूप में राम नरेश सरवन बिना खाता खोले आउट हुए उस समय टीम का स्कोर 164 रन था। छठा विकेट कप्तान क्रिस गेल के रूप में गिरा। वह रन आउट हुए उस समय टीम का स्कोर 165 रन था।
भारत की तरफ से आशीष नेहरा ने 35 रन देकर तीन खिलाड़ियों को आउट किया। वहीं जहीर खान और रवींद्र जडेजा को एक-एक विकेट मिला।
पिच गीली होने के कारण मैच आधा घंटा विलंब से शुरू हुआ। टॉस से ठीक पहले अचानक आई बारिश ने पिच को गीला कर दिया था। इसके बावजूद मैच को 20-20 ओवरों का कराने का फैसला किया गया।
IAS टॉपर बने शाह फैसल
गुरुवार, 6 मई 2010श्रीनगर के डॉक्टर शाह फैसल ने सिविल सर्विस परीक्षा-2009 में सर्वोच्च स्थान हासिल कर साबित कर दिया है कि मेहनत ही सफलता कुंजी है। उन्होंने ये मुकाम प्रथम प्रयास में ही हासिल कर लिया। शाह फैसल के पिता आतंक हमले के शिकार हो गए थे।
संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) में इस बार कुल 875 उम्मीदवरों में से 680 पुरुष और 195 महिलाओं को प्रतिष्ठित भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय विदेश सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए चयनित किया गया।
फैशल ने श्रीनगर से एमबीबीएस किया और उन्होंने पहले प्रयास में ही यह सफलता हासिल की है। उन्होंने एमबीबीएस की डिग्री हासिल करने के बाद आईएएस की तैयारी में जुट गए। और प्रथम प्रयास में ही मुकाम को पा लिया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली से बीटेक करने वाले प्राकाश राजपुरोहित ने दूसरा स्थान हासिल किया, वहीं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की इवा सहाय तीसरा स्थान हासिल करने में सफल रहीं। सहाय महिला उम्मीदवारों में शीर्ष पर हैं।
यूपीएससी के मुताबिक टॉप करने वाले 25 लोगों में से 15 पुरुष और 10 महिलाएं शामिल हैं।
सिविल सेवा परीक्षा-2009 के लिए कुल 409,101 उम्मीदवारों ने आवेदन किया था। प्रारंभिक परीक्षा में 193,091 उम्मीदवार शामिल हुए थे और 12,026 परीक्षार्थी मुख्य परीक्षा के लिए सफल हुए थे।
मार्च-अप्रैल 2010 के दौरान साक्षात्कार के लिए कुल 2,432 उम्मीदवारों का चयन किया गया था।
निरुपमा के नाम पिता का खत
बुधवार, 5 मई 2010महिला पत्रकार निरुपमा की हत्या की गुत्थी उलझती जा रही है। इस बीच एक खत सामने आया है। जो निरुपमा के पिता ने निरुपमा के नाम लिखा है। जिसमें कई राज छुपे हैं। चिट्ठी में निरुपमा के नाम से उसके पिता ने शुरू किया है.....
तुम्हारा नाम मैंने निरुपमा रखा था जिसका अर्थ है जिसकी कोई उपमा न दी जा सके। ये शब्द शंकराचार्य जी के क्षमापनस्त्रोत्रम से मैंने लिया था। वाक्य है- मयि निरुपम यत्प्रकुरुषे। तुमने जो कदम उठाया है या उठाने जा रही हो, मैं कहूंगा कि सनातन धर्म के विपरीत कदम है। आदमी जब धर्म के अनुकूल आचरण करता है तो धर्म उसकी रक्षा करता है और जब धर्म के प्रतिकूल आचरण करता है तो धर्म उसका विनाश कर देता है।
पिता ने आगे लिखा- भारतीय संविधान में यह प्रावधान है कि वयस्क लोग अपनी मर्जी से विवाह के बंधन में बंध सकते हैं। लेकिन हमारे संविधान को बने महज 60 साल ही हुए हैं इसके विपरीत हमारा धर्म सनातन कितना पुराना है कोई बता नहीं सकता है। अपने धर्म एवं संस्कृति के अनुसार उच्च वर्ण की कन्या निम्न वर्ण के वर के साथ व्याही नहीं जा सकती है। इसका प्रभाव हमेशा अनिष्टकर होता है। थोड़ी देर तक तो यह सब अच्छा लगता है लेकिन बाद में समाज, परिवार के ताने जब सुनने पड़ते हैं तो पश्चाताप के अलावा कुछ नहीं मिलता है। इस तरह के कदम से लड़का लड़की दोनों के परिवार दुखी होते हैं। मां, बाप, भाई, बहन जब दुखी होते हैं तो उनकी इच्छा के विरुद्ध काम करनेवाला जीवन में कभी सुखी नहीं होगा। ये सब चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात वाली कहावत के समान है।
धमेन्द्र पाठक
‘कसाब शैतान का नुमाइंदा है’
मंगलवार, 4 मई 2010मुंबई हमले के गुनहगार पाकिस्तानी आतंकवादी आमिर अजमल कसाब की जिंदगी और मौत का फैसला चंद घंटों बाद हो जाएगा। सरकारी वकील उज्जवल निकम की मानें तो कसाब पर नरमी बरतना भारी गलती होगी। निकम तो एक ही रट लगा रहे हैं कि कसाब को फांसी की सजा दी जाए। अदालत में अपनी दलील रखते हुए निकम ने कसाब को शैतान का नुमाइंदा और किलिंग मशीन तक करार दिया।
दरअसल मुंबई पर 26/11 के आतंकी हमलों को अंजाम देने के सभी आरोपों में दोषी ठहराए गए पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद अजमल आमिर कसाब को अभियोजन पक्ष के वकील उज्जवल निकम ने 'शैतान का नुमाइंदा' और 'हत्या की मशीन' करार दिया।
निकम की मानें तो "कसाब के लिए अधिकतम सजा मृत्युदंड और न्यूनतम आजीवन कारावास है।"
निकम ने कहा, "मैं कसाब के लिए सजा-ए-मौत चाहूंगा। यह बदले की भावना नहीं है और न ही हम बर्बर न्याय चाहते हैं। बल्कि न्याय मिलना चाहिए।"
कसाब के मामले में निकम ने कहा यह सिर्फ लोगों की हत्या का मामला नहीं है बल्कि जिस बर्बर तरीके से इसे अंजाम दिया गया उसने समाज के सामूहिक चेतना को हिलाकर रख दिया।
उन्होंने कहा कि कसाब ने लोगों की केवल हत्या ही नहीं की बल्कि इस कृत्य का मजा भी ले रहा था। यह उसके अनैतिक व्यवहार और मानव जीवन की पूर्ण उपेक्षा को दर्शाता है।
वकील ने कसाब आदमी के वेष में जहरीला सांप है जो बार-बार काटना चाहता है। इसकी तुलना किसी से करना गलत होगा। ये मानवता के नाम पर कलंक है।
दरअसल 26 नवंबर 2008 की रात जब वह छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पहुंचा तो ज्यादा भीड़ न देखकर दुखी हो गया।
उन्होंने कहा कि कसाब और उसका सहयोगी अबू इस्माइल ज्यादा से ज्यादा लोगों को मारना चाहते थे लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई। इसलिए वह दुखी हो गए थे। यह उनके अंदर 'पशु की भावना' को प्रदर्शित करती है।
मालूम हो कि 26 नवंबर, 2008 की रात पाकिस्तान से आए 10 आतंकवादियों ने मुंबई के विभिन्न स्थानों पर हमला बोला था। लगभग 60 घंटे तक इन आतंकवादियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच चले संघर्ष में 166 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 244 घायल हो गए थे।
‘मनु शर्मा को उम्रकैद की सजा गलत’
रविवार, 2 मई 2010
जेसिका लाल हत्याकांड के मुख्य दोषी मनु शर्मा को उम्रकैद की सजा सुनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास पुख्ता सबूत नहीं था। सरकार ने मनु शर्मा के खिलाफ झूठे गवाह बनाए। मनु शर्मा ने किसी भी सबूत के साथ छेड़छाड़ नहीं की। ये कहना पूर्व कानून मंत्री और जाने-माने वकील राम जेठमलानी का है। न्यूज चैनल आईबीएन7 से खास बातचीत में जेठमलानी ने ये बातें कही।
जेठमलानी की मानें तो उन्होंने कभी नैतिकता से समझौता नहीं किया, विवेक ने जो कहा वो कदम उन्होंने उठाया। उनका कहना है कि जनता वकालत के बारे में नहीं जानती, वो केवल भावनाओं के पीछे भागती है। मीडिया जो दिखाती है जनता उसी को सच मान लेती है, जो कि गलत है।
जब उनसे पूछा गया कि मनु शर्मा को हरएक जनता दोषी मान रही है तो फिर आपकी नजर में मनु कैसे निर्दोष है। इस सवाल के जवाब में जेठमलानी ने कहा कि मनु शर्मा के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं था कि उसने सबूत के साथ छेड़छाड़ की। मनु के खिलाफ सरकार से झूठे गवाह तैयार किए। यही नहीं, जेठमलानी मनु की उम्रकैद की सजा को सही नहीं मानते।
वहीं चर्चित रुचिका केस के बारे में जेठमलानी का कहना है कि 19 साल बाद फिर से ऱाठौर के खिलाफ केस दर्ज करना गलत है। उन्होंने कहा कि राठौर ने कोई रेप किया था वो केवल छेड़छाड़ का मामला था।
इसके अलावा गोधरा केस के बारे में जेठमलानी का तर्क है कि उन्होंने उस केस को गुजरात से बाहर इसलिए सुनवाई की मांग की, क्योंकि वहां कुछ पुलिस अधिकारी केस को प्रभावित करने में लगे थे। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार एसआईटी में फेरबदल चाहती थी, जो कि गलत है। एसआईटी सही जांच कर रही है।
आखिर में उनसे पूछा गया कि आप केवल विवादित केस ही क्यों लड़ते हैं, क्या आप पैसों के खातिर और सुर्खियों में बने रहने के लिए ये सब करते हैं? इस सवाल के जवाब में जेठमलानी ने कहा कि उन्हें पब्लिसिटी की जरूरत नहीं है। जहां तक पैसे कमाने की बात है तो वो 90 फीसदी केस मुफ्त में लड़ते हैं।
अजूबा, 70 साल से भूखा है प्रह्लादभाई
गुरुवार, 29 अप्रैल 2010
13 अगस्त 1929 से आज तक 79 साल बीत चुके हैं। प्रह्लादभाई की मानें तो जन्म के 9 साल बाद से उन्होंने न कुछ खाया न पीया। 70 साल से इस शख्स को भूख ही नहीं लगती। सवाल ये कि आखिर क्या कोई दैवीय शक्ति प्रह्लादभाई के साथ चल रही है। आखिर उनके शरीर को शक्ति कहां से मिलती है।
प्रह्लादभाई के मुताबिक भूख न लगना ईश्वर से मिला एक ऐसा आशीर्वाद है जो शायद दुनिया में और किसी को नहीं मिला। ये आशीर्वाद कैसे मिला इसकी भी एक बेहद दिलचस्प कहानी है। प्रह्लादभाई बचपन से श्रीनाथजी की पूजा किया करते थे। एक दिन पूजा करते हुए उन्हें महाकाली दिखने लगीं। भक्त प्रह्लाद ने जब ये बात अपने घरवालों को बताई तो सभी ने उनका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया।
लेकिन ईश्वर के इस बाल पुजारी को पूजा से कोई रोक नहीं पाया। ऐसे ही एक दिन प्रह्लाद आरती कर रहे थे। तभी वो अचानक बेहोश हो गए। प्रहालादभाई की मानें तो बेहोशी में ही महाकाली ने एक बार फिर दर्शन दिए और अपनी एक उंगली प्रह्लाद भाई की जबान पर रख दी।
प्रहालादभाई की मानें तो ‘ऊंगली रखी उसके बाद सब कुछ छोड़ दिया। मुझे कहा गया तुम योग पर चले जाओ। दरअसल मैं वैष्णव उपासक था। योग पर चला गया उसके बाद याद नहीं आ रहा की पानी क्या है। दूध का स्वाद कैसा होता है।‘
उस दिन के बाद से 70 साल बीत चुके हैं। लेकिन उन्हें न भूख लगी और न प्यास। तब से लेकर आज तक 25 हजार दिन बीत चुके हैं। लेकिन मां काली का आशीर्वाद उनके साथ ही है। दिन हो या रात। कोई भी मौसम हो प्रह्लादभाई को भूख नहीं लगती।
प्रह्लादभाई को जो शक्ति मिली वो आज भी उनके साथ है। हर मौसम में उनके साथ रहती है। लेकिन बचपन में मिली ये ताकत उनके साथ अब तक कैसे है। इसका भी एक राज है। दरअसल प्रहालाद भाई ईश्वर से आशीर्वाद मिलने के बाद हिमालय की ओर चले गए। वहां रहकर 12 साल तक उन्होंने तपस्या की।
भूख पर प्रह्लादभाई की विजय आग की तरह हर गांव और शहर में फैलती जा रही थी। लेकिन इन सबकी परवाह किए बिना वो अपने परिवार को छोड़कर हिमालय की तरफ चले गए। प्रह्लादभाई का कहना है कि वो बारह साल तक कड़कड़ाती ठंड, बर्फीले तूफान में योग करते रहे। मां काली के आशीर्वाद के बाद योग साधना ने धीरे-धीरे उन्हें और मजबूत कर दिया।
भूखे रहकर समाधि दिनों से बढ़कर महीने और महीने से बढ़कर साल तक होती चली गई। वक्त बदलता रहा, मौसम बदलता रहा, लेकिन प्रह्लादभाई ने अपनी तपस्या नहीं छोड़ी। 12 साल हिमालय के बर्फीले मौसम में वक्त गुजारने के बाद वो नर्मदा नदी के पास आ गए। यहां उन्होंने एक और घनघोर तपस्या शुरू की। कई साल तक वो पानी में ही रहकर योग करते रहे। प्रह्लादभाई की मानें तो हिमालय से लौटने के बाद उनके शरीर ने हर तरह के मौसम पर भी विजय हासिल कर ली।
प्रहालादभाई की मानें तो ‘मैं कोई आध्यात्मिक जगह पर नहीं पहुंचा हूं। जंगलों में घूमने वाला हूं। योग के जरिए अभी काफी कुछ हासिल करना है। ऋषि कह गए हैं कि बारह साल में सिद्धि मिलती है। मेरी खोज अभी जारी है। 80 साल से जंगलों में घूम रहा हूं। बुढापा लाना नहीं है।‘
भूख पर विजय हासिल करने के बाद प्रह्लादभाई ने महाराष्ट्र के जंगलों में कई साल तक तपस्या की। 45 साल तक मौनव्रत के चलते उनकी आवाज भी लगभग चली गई थी। डॉक्टरों ने हिदायद दी कि आप कुछ बोलना शुरू करें वर्ना आवाज हमेशा के लिए चली जाएगी। डॉक्टरों की इस हिदायत के बाद उन्होंने कुछ बोलना शुरू किया है। लेकिन अब भी उन्हें दिक्कत होती है।
जैसे-जैसे प्रह्लादभाई का नाम की चर्चा बढ़ती गई। लोगों के साथ ही डॉक्टर भी हैरान होते गए। मेडिकल साइंस के लिए प्रह्लादभाई थे एक जिंदा चुनौती। आखिर कैसे कोई इंसान बिना खाए-पिए जिंदा रह सकता है। इसलिए अहमदाबाद के नामी डॉक्टरों ने प्रह्लादभाई पर रिसर्च करने की ठानी। तीन सौ बड़े डॉक्टरों की एक टीम बनाकर प्रह्लादभाई पर रिसर्च शुरू कर दी गई।
मेरे पास अमिताभ है...!
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010एक नाम जो कई माइने-आइने दिखाता है, वो नाम हर वो बोली बोलता है। कभी दहाड़ता है तो कभी झुककर अभिवादन भी करता है। कहावत है कि एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, परंतु इसे सिक्के में दो पहलू तो हैं लेकिन दोनों एक जैसे!
इनकी ऐसी सधी चाल जिसमें अगर जीत पक्की ना हो, लेकिन हार भी नहीं होती। भले ही इस दामन पर कुछ बदनुमा दाग हो, लेकिन फिर भी इनके आगे विरोधी नहीं टिकते, अपनों ने तो मानो घुटने की टेक दिए हों। जी हां, हम बात करे रहे हैं राजनीति के धुरंधर नरेन्द्र मोदी की।
मोदी वैसे तो पर्दे पर दहाड़ने और विरोधियों पर तीखे प्रहार के लिए जाने जाते हैं। लेकिन कभी-कभी ये पर्दे के पीछे से भी ऐसा तीर चलाते हैं। जिससे विरोधी घायल ही नहीं, चीखने लगता है। आखिर चीखे भी क्यों नहीं! मोदी ऐसी चाल ही चलते हैं जिससे सामने वाले को डंक लग जाता है। और फिर दुहाई का सिलसिला चलता है। लेकिन बेफ्रिक मोदी जोर का झटका जोर से ही देते हैं।
हाल ही में मोदी ने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को अपने कारवां में शामिल कर शतरंज की नई बिसात रच दी है। मोदी के आमंत्रण पर अमिताभ बच्चन गुजरात टूरिज्म के ब्रांड एम्बेसडर बनने को तैयार हो गए हैं। जल्द ही अमिताभ मोदी सरकार का गुणगान करते नजर आएंगे। यानी मोदी की धुन पर बिग बी थिरकने वाले हैं।
मोदी के नगर में अमिताभ की डगर को देख विरोधियों ने दुहाई देने का सिलसिला शुरू भी कर दिया है। आखिर लड़ाई की धुरी में अमिताभ बच्चन जो हैं। कांग्रेस ने तो यहां तक कह डाला कि अमिताभ गलत जगह फंस गए हैं। मोदी अपनी दागदार छवि को सुधारने के लिए अमिताभ को मोहरा बनाया है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर कांग्रेस को ये सब कहने की जरूरत क्यों आन पड़ी?
क्या ये कांग्रेस की झुंझलाहट नहीं है। हां, झुंझलाहट होना लाजिमी है, बात जो अमिताभ बच्चन की है। जो कभी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेहद करीबी माने जाते थे। लेकिन समय के साथ सबकुछ बदल गया, राजनीति, किरदार और तो और दोस्ती के मायने भी बदल गए। आज अमिताभ सबसे बड़े सुपरस्टार हैं लेकिन कांग्रेस के हाथ के साथ नहीं हैं।
अमिताभ का मशहूर डायलॉग 'मैं जहां पे खड़ा होता हूं लाइन वहीं से शुरू होती है' आज के अमिताभ के किरदार के साथ बिल्कुल फिट बैठता है। क्योंकि आज अमिताभ जहां खड़े होते हैं बॉलीवुड वहीं से शुरू होता है। यूं कहें एक कुली, दीवार और जंजीर को तोड़ते हुए नि:शब्द होकर सरकार की परवाह किए बिना शोले, वक्त और आग पर चलते हुए एक मासूम की किरदार में प्रकट होते हैं। आज वो हर एक किरदार जो अमिताभ से होकर ही गुजरता है। गुजरे भी कैसे नहीं, 40 साल की कड़ी मेहनत जो है इसके पीछे।
ये तो बात हुई अमिताभ की जो बॉलीवुड में प्रयोग के लिए जाने जाते हैं। लेकिन राजनीति में मोदी भी अमिताभ से कुछ कम नहीं। भले ही राजनीति में मोदी की लकीर ना हों। लेकिन मोदी को राजनीति को नया मोड़ देने में महारत हासिल है। मौका देखकर चौका लगाना वो अच्छी तरह से जानते हैं। ऐसा चौका जिसको मारने में कोई खतरा नहीं। क्योंकि मोदी राजनीति के अखाड़े से इतनी तो कल्पना कर ही लेते हैं कि अगर गेंद कुछ देर और हवा में होती तो शायद छक्का ही होता। यानी मोदी की एक ऐसी शॉट जिसपर आउट होने का कोई खतरा नहीं।
साफ शब्दों में कहें तो मोदी ने अमिताभ को ब्रांड एम्बेसडर के लिए राजी कर राजनीति के अखाड़े में एक जोरदार शॉट लगाया है। जिसके पीछे कांग्रेस भाग रही है लेकिन उसके हाथ कुछ भी नहीं आएगी। कोई कुछ कहे, लेकिन मोदी कभी-कभी अपनी अकेले की चाल से कांग्रेस पर भारी पड़ जाते हैं।
दरअसल मोदी ने 'पा' क्या देखी ऑरो को ही गोद ले लिया। और राजनीति के गलियारों में हलचल मच गई। लेकिन इस हलचल से अमिताभ और मोदी दोनों बेफ्रिक हैं। मानो दो बिछड़े एक-दूसरे के सहारे के लिए साथ हो गए हैं। आखिर ये तो होना ही था। क्योंकि अमिताभ के मुंहबोले छोटे भाई अमर सिंह खुद साइकिल से उतर चुके हैं तो वहां अमिताभ की क्या पूछ। अमिताभ भी कहते हैं वो तो बस एक कलाकार हैं और लोगों का मनोरंजन करते हैं। हां, ये अलग बात है कि कुछ साल पहले ये साइकिल पर सवार होकर यूपी में जुर्म करने होने का ऐलान किया करते थे। और अब मोदी का भगवा झंडा बुलंद करेंगे। किसी ने सच ही कहा है कि समय बड़ा बलवान होता है।
खून के आंसू रुलाया साल 2009 ने!
मंगलवार, 29 दिसंबर 2009नया साल दस्तक दे रहा है। हम दुआ करेंगे कि नया साल आपके लिए ढेरों खुशियां ले आए। लेकिन इस नए साल की तरफ कदम बढ़ाते वक्त ज़रूरी है गुजरते हुए साल पर एक नज़र डालना, क्योंकि इतिहास ही भविष्य की नींव रखता है। आखिर कैसा रहा साल 2009। क्या हैं इस साल की कड़वी यादें जिसका असर आने वाले साल पर हो सकता है। क्या थी हमारी खामियां जिनसे हमें सबक लेने और होशियार रहने की ज़रूरत है।
बाढ़ की खौफनाक यादें
2009 में आई बाढ़ किसी प्रलय से कम नहीं था। देश के पांच राज्य कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा में भयानक बाढ़ आई। लेकिन तीन राज्य इस बाढ़ की चपेट में सबसे बुरी तरह आएं। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र।
इन तीनों राज्यों में लगभग पचास लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए।
आंध्र प्रदेश के पांच कूरनूल, महबूबनगर, कृष्णा, गुंटूर और नालगोंडा पर बाढ़ का कहर बरपा। हजारों घर पानी में डूब गए। सेना लोगों को खोज रही थी। बचाने की कोशिश कर रही थी। सबसे बुरी तरह से प्रभावित जिसे कूरनूल में हालात और गंभीर थे। पांच अक्टूबर तक यहां के लाख लोगों को बाढ़ अपनी चपेट में ले चुका था। 43 हजार घरों को पानी ने लील लिया था।
कर्नाटक का भी पिंड इस विपदा से नहीं छूटा था। उसके 15 जिले बाढ़ से प्रभावित थे। बाढ़ का सबसे ज्यादा असर हुआ था बीजापुर, रायचूर, उत्तर कन्नड़, धारवाड़, और कोप्पल में। आंध्र और कर्नाटक में कुल मिलाकर सात लाख से ज्यादा लोग सरकारी रिलीफ कैंप में रहे के लिए मजबूर हो गए। कईयों को तो वो भी नसीब नहीं हुआ। मानसून का इस कहर ने दक्षिण को खून के आंसू रुलाया। जिसका दर्द आज भी कायम है।
महाराष्ट्र के कई जिलों में लगातार बारिश की वजह से नदियां उफान मारने लगी। राज्य के आठ जिलों में बारिश ने भारी तबाही मचाई। यहां के लगभग एक लाख हेक्टेयर जमीन की फसल पानी में डूब गई। बारिश ने राज्य में 25 से ज्यादा लोगों की जान ले ली।
उधर गोवा का हाल भी कुछ अच्छा नहीं था। वहां पर भी 2 अक्टूबर से पांच अक्टूबर तक लगातार बारिश हो रही थी। यहां के कई इलाकों में बाढ़ आ गया। मदद के लिए सेना और नौसेना को आना पड़ा। अकेले कैनाकोना इलाके में 20 से 25 करोड़ का नुकसान हुआ है। भातपोल, नवोदया और किंडलेम इलाके में भी पानी नें हाहाकार मचाया है।
गुजरात के जुनागढ़, पोरबंदर और जामनगर जिले में भारी बारिश ने अपना कहर बरपाया था। सड़क, पुल यातायात के सभी साधन पानी में डूब गए थे। खेत खलिहान भी पानी की भेट चढ़ गए थे। अरबों का नुकसान हुआ था।
किसानों की गोद सूनी रही इस साल
2009 में देश के किसी हिस्से में बाढ़ ने कहर बरपाया तो कहीं सूखा आफत बनकर टूटा। राजस्थान, यूपी, विदर्भ पर सूखे की ऐसी मार पड़ी कि लोग त्राहि त्राहि करने लगे। जहां कि फसलें बारिश नहीं बर्बाद कर पाई वहां सूखा अपना काम कर गया। कर्ज के बोझ तले दबे कई किसोनों ने तिल-तिल कर मरने की बजाए मौत का रास्ता चुन लिया।
37 साल में पहली बार देश ने भयानक सूखे का सामना किया। पानी की आस लगाए किसान के दिन बीतते रहे लेकिन कठोर बादलों से एक बूंद न बरसी। ये था 2009 में पड़े सूखे का कहर। सूखे ने देश के एक बड़े हिस्से पर कहर ढाया। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान महाराष्ट्र का विदर्भ इलाका, और आंध्र प्रदेश भी सूखे की चपेट में आ गया। किसान करे तो क्या करे। थक हारकर खुदकुशी का रास्ता चुन लिया।
पश्चिमी उत्तरप्रदेश के गन्ना उत्पादक क्षेत्र में औसत मात्रा से 91 फीसदी कम बारिश हुई। बुंदेलखंड का हाल तो सबसे बुरा था। पानी की कमी से खेत के खेत सूखते जा रहे थे। किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे थे। दूसरी तरफ बिहार एक अलग ही समस्या से जूझ रहा था।
उत्तरी बिहार जहां बाढ़ की चपेट में था तो वहीं दक्षिणी बिहार पर सूखे की मार पड़ी। राजस्थान के 34 में से 26 जिले सूखे की चपेट में थे। इनमें जयपुर, टोंक, सवाई माधोपुर, करौली, दौसा, अजमेर और भीलवाड़ा में हालात भयानक थे। पूर्वी राजस्थान के बाकी जिलों की हालत भी खराब थी।
आंध्र प्रदेश के कई जिलों में अगस्त के महीने जहां 624 मीली मीटर बारिश होती थी वहीं बारिश की ये मात्रा गिरकर मात्र 153 मीली मीटर रह गई। ये आंध्र प्रदेश के लिए पिछले 50 सालों में सबसे खराब स्थित थी। और जब बारिश हुई तो इतनी हुई कि बाढ़ आ गई।
महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके का हाल तो और भी खराब था। सूखे से बर्बाद होती फसल को देख कई किसानों ने आत्महत्या कर ली।
देश में सूखे के हालात को देखते हुए सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। शुरुआती दिनों में कृषि मंत्री शरद पवार मानसून आने में हो रही देर को सामान्य मान रहे थे। लेकिन दिनों दिन खराब होती स्थिति और संसद में विपक्षी दलों के बढ़ते दबाव ने उन्हें देश के प्रभावित हिस्सों को सूखा ग्रस्त घोषित करने पर मजबूर कर दिया।
जब तक सरकार को हालात की गंभीरता का अंदाजा हुआ बात हाथ से निकल चुकी थी। फसलों को भारी नुकसान पहुंचा। सरकार के राहत पैकेज भी काम न आए। नतीजा खाने पीने की चीजों के दाम आसमान छूने लगे। इसका सीधा सीधा असर आम इंसान की जेब पर पड़ा। यानि एक आम आदमी के लिए बहुत बुरा साल था 2009।
साल 2009 में भस्मासुर बनकर उभरी महंगाई
सूखे और बाढ़ की मार झेल रहे देश का सामना अब महंगाई के भस्मासुर से होना था। फसलें बर्बाद होने से उत्पादन में कमी आ गई। जाहिर है करोड़ों लोगों की जेब पर डाका तो पड़ना ही था। खाने पीने की चीजों के दाम इतने बढ़ गए कि एक-एक निवाला हलक से उतरना मुश्किल हो गया।
महंगाई पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए। बार-बार दावे किए कि जल्द ही महंगाई पर काबू पा लिया जाएगा। लेकिन सरकार की तमाम नीतियां बढ़ती कीमतों के आगे बौनी साबित हुईं। 2009 में कीमतें बढ़ती रहीं और आम आदमी पिसता रहा।
वहीं 2009 तो खत्म होने को है लेकिन आम आदमी का सवाल खत्म नहीं हुआ। उसकी जुबान पर यही सवाल है कि क्या आने वाले दिनों में महंगाई खत्म होगी? 2009 की तरह ही आम आदमी 2010 से भी डरा हुआ है। इसलिए वो सरकार से भी एक सवाल पूछ रहा है। तुमने अब तक मेरे लिए क्या किया?
दरअसल महंगाई पर राजनीति तो खूब हुई लेकिन आम आदमी को राहत देने के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनी। आम आदमी को उसके हाल पर छोड़ दिया सरकार ने। अब आम आदमी का मुद्दा अगर संसद में न उठे तो फिर पक्ष और विपक्ष किस काम के। आम आदमी के घर में ही नहीं संसद के दोनों सदनों में महंगाई के मुद्दे पर मार मची। सरकार के कोढ़ में खाज का काम किया वित्त मंत्रालय संसदीय स्थाई समिती की रिपोर्ट ने जिसमें मंत्रालय को महंगाई पर लगाम लगाने में पूरी तरह नाकाम बताया गया।
सरकार ने भी कहीं न कहीं मान लिया कि आम आदमी को महंगाई से निजात दिलाने का उसके पास रास्ता नहीं है। उसपर लगातार आते महंगाई दर के आंकड़ों ने उसे कई बार डराया। खाद्य पदार्थों की महंगाई दर दिसंबर आते-आते 20 फीसदी तक पहुंच गई। सरकार ने चिंता जताई लेकिन हुआ कुछ नहीं। जाहिर है कीमतों पर काबू पाने के तमाम दावे हवा हो गए इसलिए सरकार के पास आम आदमी को दिलासा देने के लिए सिवाए चिंता जताने के और कुछ नहीं बचा।
शुरू में तो सरकार ने कहा कि आयात बढ़ाकर महंगाई को काबू में कर लेंगे। लेकिन ये दावा भी जल्द ही गलत भी साबित हो गया। पता चला कि विदेश से ऊंचे दाम पर होने वाला आयात आम आदमी की झुकी हुई कमर को पूरी तरह तोड़ देगा। इसलिए अगली फसल आने तक महंगाई को काबू करने की बात तय हुई। इसी बीच आया कृषि मंत्री शरद पवार का वो बयान जिसने बेतहाशा बढ़ती महंगाई के लिए ग्लोबल वॉर्मिंग को जिम्मेदार ठहरा दिया। यानि महंगाई बढ़ने के लिए सरकार की नीतियां नहीं ग्लोबल वॉर्मिंग जिम्मेदार है।
इतना ही नहीं सरकार ने तो महंगाई के लिए राज्य सरकारों पर ठीकरा फोड़ दिया। केंद्र के मुताबिक वो गरीबों के लिए सस्ता राशन तो जारी कर रही है लेकिन राज्यों का राशनिंग सिस्टम इतना खराब है कि इसका फायदा उन तक नहीं पहुंच पा रहा। यानि केंद्र तो अपनी तरफ से राशन भेजकर चैन की बंसी बजा रहा है अगर राज्य आम आदमी तक उसे न पहुंचाएं तो केंद्र का क्या कसूर। और दोनों की इस लड़ाई में आम आदमी पिसता है तो पिसता रहा।
सरकार ने आम आदमी की नहीं सुनी। उसे लगा कि अपनी बारी का इंतजार कर रही विरोधी पार्टी उसका दर्द समझेगी। लेकिन यहीं भी आम आदमी को दगा ही मिला। विरोधियों ने तो सिर्फ राजनीति चमकाने के लिए महंगाई पर सरकार को घेरने का काम किया। आम आदमी का दिल एक बार फिर टूट गया।
महंगाई शायद चुनाव जीतने का मुद्दा नहीं होती। मुद्दा बनते हैं मंदिर मस्जिद, मुद्दा बनता है आतंकवाद। 2009 में यही जंग सरकार और विरोधी दलों के बीच चल रही थी। एक जंग आम आदमी खुद से लड़ रहा था। जंग जिंदगी की। जंग अपना पेट भरने की। 2009 में आम इंसान की किसी ने नहीं सुनी न सरकार ने न भगवान ने। बाकी जो बचा था महंगाई मार गई। ऊपर से मंदी ऐसी छाई कि कहने ही क्या? खाने पीने की चीजों के दाम तो बढ़ते रहे लेकिन तनख्वाह नहीं बढ़ी। आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया। सोचिए साल 2009 में कैसे गुजारा किया आम आदमी ने?
मंदी की मार से घुट-घुट कर जिया
2009 सबसे बुरा उन लोगों के लिए साबित हुआ जिनकी नौकरियां छीन ली गईं। मंदी की मार ने कई कंपनियों को अपना काम समेटने के लिए मजबूर कर दिया। नतीजा ये हुआ कि कई साल से काम कर रहे हजारों कर्मचारियों की छंटनी हो गई।
साल 2008 में अमेरिका से उठा मंदी का तूफान 2009 में भारत पहुंच गया। साल शुरू होने से पहले ही अमेरिका के दो बडे़ बैंकों लेमन ब्रदर्स और मेरि लिंच का दीवालिया होना भारत के बैंकों में भी हड़कंप मचा गया। कई लोग तो मारे डर के बैंकों से अपना पैसा निकालने लगे। वो घबरा गए कि कहीं उनका बैंक दीवालिया न हो जाए। लेकिन मंदी का असली असर तो भारत में दिखना अभी बाकी था।
अमेरिका के बाद मंदी दूसरे देशों में भी पहुंची और इसके साथ ही वहां काम कर रहे भारतीयों की नौकरियां चली गईं। साल की शुरुआत में ही ग्लोबल मंदी का राक्षस विदेश में तकरीबन 20000 भारतीयों की नौकरी एक झटके में खा गया।
विदेश जाकर पैसा कमाने की चाह ने सैकड़ों नौजवानों के सपने चकनाचूर कर दिए। साल खत्म होते-होते दुबई दीवालिया होने की कगार पर पहुंच गया। नतीजा ये हुआ वहां काम करने गए भारतीयों की नौकरी चली गई। जो लोग ईद की छुट्टी में अपने घर आए थे उन्हें एसएमएस पर ही नौकरी पर न लौटने का आदेश मिल गया।
जानकारों ने कहा कि पिछले 10 साल में ऐसे बुरे दिन भारत ने नहीं देखे। साल 2009 बेहद खराब रहा। साल भर भारत में छंटनी का सिलसिला चलता रहा। जिस सेक्टर पर देखो मंदी का साया। आईटी, रियल एस्टेट, मीडिया इंडस्ट्री में हजारों लोगों की नौकरियां चली गईं। छोटी मोटी कंपनियां तो मंदी की आंधी में उड़ गईं।
जिस कंपनी को देखो कर्मचारियों की नौकरी खाने पर आमादा थी। जो लोग किसी तरह छंटनी से बच गए वो साल भर इसी चिंता में जीते रहे कि नौकरी हाथ से अब गई, कि तब गई। न जाने कंपनी कब पिंक स्लिप थमा दे। पिंक स्लिप यानि हिसाब करके नौकरी से निकालने का फरमान।
हालात और बुरे होते गए कई दिग्गज कंपनियों में कर्मचारियों की न तो तरक्की हुई न तनख्वाह बढ़ी। ऊपर से कंगाली में आटा गीला ऐसा कि तनख्वाह में कटौती कर दी गई। कंपनी की तरफ से मिलने वाली कई सुविधाएं भी खत्म कर दी गईं। दफ्तरों की कैंटीन में मिलने वाली सब्सिडी भी वापस ले ली गई। यानि जितनी भी तनख्वाह हाथ में बची उसी से गुजारा करना पड़ा। शुक्र इस बात का था कि चलो कम से नौकरी तो बची है।
साल जाते-जाते सरकार की तरफ से आई एक बुरी खबर। अब पर्क्स यानि कंपनी की तरफ से मिलने वाले भत्ते भी तनख्वाह में जोड़ दिए गए और उन पर टैक्स भी कटेगा। पर्क्स पर ये टैक्स अप्रैल 2009 से लगेगा। यानि अगर आपको कंपनी की तरफ से कार का मेंटेनेंस और पेट्रोल का खर्च मिलता है, ड्राइवर मिला है और उसका निजी इस्तेमाल हो रहा है तो ये सब तनख्वाह में जुड़कर टैक्स का बोझ बढ़ाएगा।
यानि एफबीटी खत्म करके सरकार ने जो साहत लोगों को दी थी वो साल के आखिर में वापस भी ले ली। आम आदमी तो आम आदमी खास आदमी की जेब से भी 2009, जाते जाते कुछ न कुछ लेकर ही गया।
तबाही के लिए याद रहेगा साल 2009
देश की तरक्की का सबसे ज्यादा दारोमदार कृषि पर होता है। लेकिन 2009 में मॉनसून और सूखे ने इस सेक्टर को तबाह कर दिया। निर्यात गिरने से करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ। उधर रियल एस्टेट कारोबार का हाल भी बहुत बुरा था।
दरअसल मंदी ने देश की सूरत ऐसी बिगाड़ी कि उसे संवारते-संवारते पूरा साल बीत गया। विकास के पहिए की रफ्तार घूमते घूमते मंद पड़ गई। देश की तरक्की का एक बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र पर टिका हुआ है। पहली तिमाही में कृषि क्षेत्र की विकास दर 2.5 फीसदी थी। दूसरी तिमाही में कृषि विकास दर गिरकर सिर्फ 1 फीसदी रह गई।
इसकी सबसे बड़ी वजह थी मॉनसून और सूखे ने जो कहर। संतुलित विकास के लिए इस क्षेत्र को 4 फीसदी की दर से बढ़ना चाहिए। लेकिन कृषि का विकास हुआ सिर्फ एक फीसदी। अब तीसरी तीमाही में तो इसके नकारात्मक होने का डर सता रहा है। जब देश में अनाज ही नहीं हुआ तो विकास क्या होगा। रबी की फसल के उत्पादन में करीब 18 फीसदी की गिरावट आई।
2009 में मेन्युफैक्चरिंग, एक्सपोर्ट और सर्विस सेक्टर ने विकास में भूमिका तो निभाई लेकिन इनका हाल भी कोई बहुत अच्छा नहीं रहा। सरकार अब उम्मीद कर रही है आने वाले वक्त में विकास मौजूदा दर 8 फीसदी से ज्यादा हो। आम इंसान ही नहीं सरकार भी इस बुरे साल को जल्द से जल्द भूलना चाहेगी।
सहवाग रिचर्ड्स से आगे!
बुधवार, 16 दिसंबर 2009
80 के दशक में विवियन रिचर्ड्स का खौफ इस कदर था कि उन्हें सबसे विस्फोटक बल्लेबाज का रुतबा हासिल था। आज वही रुतबा वीरेंद्र सहवाग को मिला चुका है। ऐसे में एक सवाल ये उठता है कि विव बड़े या वीरू?
टीम इंडिया के पूर्व कप्तान और सहवाग के शुरुआती मार्गदर्शक सौरव गांगुली ने बेबाक अंदाज में एक बार फिर से कह डाला कि सहवाग को अब भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लंबा रास्ता तय करना है। खुद सहवाग भी अपने पूर्व कप्तान की राय से इत्तेफाक रखते हैं।
लेकिन, इतना तय है कि जिस तरह से सचिन तेंदुलकर को भारत के बाहर कभी भी क्रिकेट जगत सर डॉन ब्रैडमैन से बेहतर नहीं मानेगा ठीक उसी तरह सहवाग को भारत से बाहर शायद विव रिचर्ड्स से बेहतर नहीं माना जाएगा। सर्वकालीन महान खिलाड़ी से तुलना होना ही अपने आप में एक अनोखी बात है। आखिर, तेंदुलकर की महानता लारा, पोंटिंग, हेडेन या फिर गिलक्रिस्ट से तभी अलग हुई जब खुद डॉन ने उनके खेल में अपनी शैली की झलक देखी।
ऐसे में अगर सहवाग की असाधारण आक्रामकता में किंग रिचर्ड्स की झलक मिलती है तो इससे अच्छी तारीफ और क्या होगी? वनडे क्रिकेट में सहवाग रिचर्ड्स के करीब तो क्या टेस्ट क्रिकेट में खुद की ही साख के करीब नहीं पहुंच पाते।
रिचर्ड्स ने पूरे करियर के दौरान 187 वनडे खेले और मिडिल-ओवर्स में बल्लेबाजी की। इस दौरान दोनों सहवाग के नाम 8 तो रिचर्ड्स के नाम 11 शतक है। हालांकि अर्धशतक में ये फासला 17 का है। रिचर्ड्स के नाम 45 और सहवाग के नाम 28 है। स्ट्राइक रेट में सहवाग का पलड़ा भारी है लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि रिचर्ड्स ने ना तो कभी 'सर्किल' और न ही 'पावर-प्ले में बल्लेबाजी की। सबसे अहम अंतर दोनों बल्लेबाजों के बीच 16 की औसत का है।
ज़ाहिर सी बात है वनडे क्रिकेट में सहवाग रिचर्ड्स के करीब तो क्या अपने समकालीन धुरंधरों में से तेंदुलकर, गांगुली और जयसूर्या के भी पास नहीं पहुंचते हैं। ऐसे में खुद को रिचर्ड्स की श्रेणी में लाने के लिए सहवाग को राजकोट जैसी कई पारियां खेलनी होगी। वनडे में अगर विवयन रिचर्ड्स के आंकड़े बेहतर हो तो टेस्ट में बाजी सहवाग मार लेते है। ये तो सब मानते है कि नजफगढ़ के नवाब में सर विवयन रिचर्ड्स की झलक मिलती है। लेकिन क्या वीरू की लंबी चौड़ी टेस्ट पारियां उन्हें रिचडर्स से बेहतर बनाती है?
अगर 72 टेस्ट मैच के आंकड़ों को देखें रिचर्ड्स और सहवाग के औसत 3 का फर्क है। लेकिन स्टाइक रेट मतलब हर सौ गेंद पर ज़्यादा रन बनाने के माल में सहवाग और रिचड्स के बीच करीब 10 अंक का फर्क है। इसका साफ मतलब है कि सहवाग रिचडर्स से ज़्यादा तेज़ी से रन जुटाते हैं। यही नहीं 72 मैचों तक रिचर्ड्स नाम 150 से ज़्यादा रनों वाली सिर्फ 6 पारियां थी, जबकि सहवाग के नाम ये संख्या दुगुनी है। शतक के मामले में इस दौरान रिचर्ड्स सिर्फ सहवाग से 1 अंक से बेहतर हैं।
अगर 5000 टेस्ट रन बनाने के पैमाने को आधार मानें तो सिर्फ कपिल देव और ऐडम गिलक्रिस्ट का स्ट्राइक सहवाग से बेहतर है। लेकिन ये दोनों खिलाड़ी मुख्य बल्लेबाज़ होने के बजाए अपने टीम के लिए ऑल-राउंडर थे औऱ 7वें नम्बर पर बल्लेबाज़ी करते थे।
मौजूदा पीढ़ी में भले ही लोगों को विवियन रिचर्ड्स के आंकड़े ज़ुबा पर नही हों लेकिन उनका नाम आते ही हर किसी को उनके खौफ, दबदबे और महानता का एहसास तुंरत हो जाता है। आने वाली पीढ़ी भी अगर सहवाग के रिटायरमेंट के बाद उनके आंकड़ों की बजाए सिर्फ उनके नाम से ही रोमांचित हो उठे और वाह करने लगे तो कोई हैरान नहीं होगा। और ये कमाल रिचर्ड्स का कोई सच्चा उत्तराधिकारी ही कर सकता था।
बॉलीवुड में कितने भगवान?
गुरुवार, 10 दिसंबर 2009
बॉलीवुड में कलाकारों को भगवान कहने कहा सिलसिला शुरू हो गया है। खासकर अमिताभ, शाहरुख, राजकपूर और आमिर को भगवान कहने वालों की कमी नहीं है। आखिर क्यों इन्हें भगवान कहा जाता है?
दरअसल सितारों की इस मायानगरी में अचानक भगवान का सिलसिला क्यों शुरू हो गया। अभिषेक बच्चन ने कह दिया मेरे पिता अमिताभ बच्चन बॉलीवुड के भगवान हैं। विवेक ओबराय ने कहते हैं कि उनके लिए तो शाहरुख खान भगवान हैं। जबकि रणबीर कपूर के लिए उनके दादा राजकपूर भगवान है। वहीं आमिर की तो बात ही अलग है उन्होंने खुद को ही भगवान बता दिया।
क्या फिल्मों में ब्रेक देने वाले लोग जो पहले गाड फादर कहलाते थे अब उन्हीं का नया नाम हो गया है भगवान? या फिर बड़े सितारों को भगवान कहने के पीछे कुछ और है राज।
अमिताभ
अमिताभ बच्चन सिर्फ किसी फिल्म में काम करके उसका मेहनताना लेने वाले कलाकार नहीं हैं। बल्कि अमिताभ फिल्मों के अलावा एड और टेलीविजन की दुनिया में भी बड़े नाम हैं।
एबी कार्प नाम की कंपनी के जरिये अमिताभ बच्चन से सैंकड़ों लोगों की रोजी रोटी चलती है। फिर भी भगवान कहे जाने के इस चलन से बॉलीवुड के बहुत सारे जानकार इत्तेफाक नहीं रखते।
शाहरुख
शाहरुख खान सिर्फ एक फिल्म स्टार नहीं बल्कि खुद में ही एक इंडस्ट्री है। रेड चिलीज इंटरटेनमेंट के नाम से शाहरुख का प्रोडक्शन हाउस सिर्फ अपनी फिल्में ही नहीं बनाता बल्कि दूसरे सितारों को भी काम देता है। कई हजार टेक्नीशियन्स और अभिनेताओं के लिए शाहरुख खान भगवान हैं।
आमिर
आमिर खान ऐसा खान जो खुद फिल्मों के पीछे नहीं भागता बल्कि फिल्में इनके पीछे भागती है। साल में सिर्फ एक फिल्म ही करते हैं लेकिन कोई कसर नहीं छोड़ते। ये शख्स आज जिस बुलंदी पर है वहां पहुंच कर ये खुद को ही भगवान कह देता है।
राज कपूर
राज कपूर फिल्मों में काम करने को एक बिजनेस की शक्ल दे देने के काम की शुरुआत अगर किसी ने की तो वो थे राज कपूर। आर के स्टूडियो की स्थापना करके राज कपूर ने बॉलीवुड के स्टार्स को बिजनेस मैन बनने की राह दिखाई। राज कपूर के वो सपना आज सैंकड़ों लोगों का रोजगार है।
पवित्र ‘गंगा’ को बचाना है
शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009
गंगा जीवन का दूसरा नाम है। दुनियाभर में ऐसी कोई नदी नहीं जो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को जिंदगी देती है। लेकिन गंगा की हालत खराब है। शहरों और उद्योगों के कूड़े करकट ने गंगा की रफ्तार थाम दी है। लेकिन अब सरकार को भी समझ आने लगा है। जिंदगी बचानी है तो गंगा को बचाना होगा।
केन्द्र सरकार ने मिशन क्लीन गंगा शुरू की है। इसके लिए नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी का गठन किया गया है। सरकार का दावा है कि साल 2020 तक गंगा को साफ कर लिया जाएगा। मिशन क्लीन गंगा में 400 करोड़ अमेरिकी डॉलर का खर्च आएगा। इसमें से 100 करोड़ डॉलर वर्ल्ड बैंक से मिलेगा।
बाइट- वर्ल्ड बैंक वाले की।
मिशन है कि अगले दस सालों में शहरों से कोई भी कचरा गंगा में न गिरे। लेकिन क्या हम सरकार के इस दावे पर भरोसा कर सकते हैं। मुश्किल है, क्योंकि इतिहास इसकी इज़ाजत नहीं देता। 1985 में शुरू हुए गंगा एक्शन प्लान के अंतर्गत अभी तक 1500 करोड़ रुपए से ज्यादा रुपए खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। अभी भी शहरों और उद्योगों का 45 फीसदी कचरा गंगा में गिरता है। ज़ाहिर है गंगा एक्शन प्लान का पैसा गंगा की जगह अफसरों और नेताओं की जेब में चला गया।
दरअसल मोक्ष की नगरी काशी। देश भर से ही नहीं बल्कि दुनिया भर से लोग मोक्ष की तलाश में बनारस आते हैं। घंटों गंगा मैय्या की जय-जयकार करते हैं। श्रद्धालुओं के लिए गंगा एक महज एक नदी नहीं बल्कि आस्था और विश्वास का प्रतीक है। लेकिन धर्म के रूप में बहने वाली गंगा मैली हो गई है।
25 साल पहले राजीव गांधी ने सेन्ट्रल गंगा कमेटी बनाई। जिसकी देख रेख में गंगा को दो चरणों में साफ करना था। पहले चरण में 261 योजनाएं बनीं जिसमें से 251 को पूरा माना गया। दूसरा चरण २२ सौ करोड़ रुपए में शुरू हुआ जिसमें 435 योजनाएं बनी। गंगा को साफ करने के लिए 1503 करोड़ रुपए पानी की तरह बहा दिए गए लेकिन गंगा मैली की मैली ही रही। लेकिन गंगा के नाम पर राजनीति करने वालों की दुकान खूब फली फूली।
कैग रिपोर्ट की मानें तो अब तक गंगा के नाम पर कई हजार करोड़ खर्च हो चुके हैं लेकिन गंगा की हालत बद से बदतर होती जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गंगा का पानी नहाने के लायक तक भी नहीं है। वाराणसी में रोजाना 22 करोड़ लीटर पानी सीवेज में जाता है। जबकि यहां के सीवेज केंद्र में महज 10 करोड़ लीटर पानी ही ट्रीट हो पाता है यानि 12 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में चला जाता है।
जाहिर है खतरे की घंटी बज चुकी है। अगर अब भी हम गंगा की सफाई को लेकर पहले जैसे लापरवाह बने रहे तो हालात काबू से बहार हो जाएंगे। देश की संस्कृति की प्रतीक गंगा को बचाने के लिए जरूरत है एक भागीरथी प्रयास की।
गंदगी होने के बाद भी आस्था लोगों को गंगा के तट तक खींच ही लाती है। धार्मिक रीति रिवाज के लिए लोगों को मजबूरन गंगा की शरण में आना पड़ता है। हरिद्वार दूर होने की वजह से दिल्ली और आसपास के लोग ब्रजघाट पर आने के लिए मजबूर हैं। सभी जानते हैं कि गंगा मैली है लेकिन मन में एक विश्वास है कि गंगा की गोद में गंदगी भी साफ हो जाती है।
शाहरुख ने अमिताभ को गले लगाया
गुरुवार, 3 दिसंबर 2009
बादशाह और शहंशाह हुए एक। जी हां, अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान ने सारे गिले-शिकवे को भुलाकर दोस्ती की नई पारी की शुरुआत कर दी है। दरअसल अमिताभ बच्चन की आने वाली फिल्म ‘पा’ की चर्चा इन दिनों हर तरफ है। अमिताभ बच्चन की इस फिल्म में खास बात ये है कि अभिषेक अमिताभ के पिता बने हैं। अमिताभ ने फिल्म में एक ऐसे बच्चे का रोल निभाया है जो प्राजेरिया नाम की एक बीमारी से पीड़ित है। ये फिल्म इस शुक्रवार को रिलीज हो रही है गुरुवार को मुंबई में इसका प्रीमियर हुआ। जिसमें पूरा बॉलीवुड जमा हुआ। खास बात ये रही की प्रीमियर के मौके पर शाहरुख खान भी पहुंचे और गले लगाकर बिग बी को बधाई दी। शाहरुख के अलावा आमिर, अक्षय कुमार, अजय देवगन, यश चौपड़ा, ऋतिक रौशन, जुही चावला, आशुतोष गोवरीकर, बिधु बिनोद चौपड़ा समते कई जानी मानी हस्तियां प्रीमियर के मौके पर पहुंची।
