क्यों टूट रहे हैं शादी के अटूट बंधन?

शुक्रवार, 19 जून 2009

कहते हैं जोड़ियां ईश्वर के दरबार में बनती हैं। पति-पत्नी का अटूट रिश्ता कुदरत पहले से तय कर देता है। शायद इसीलिए इस नाजुक और अटूट रिश्ते को दुनिया का सबसे पवित्र बंधन कहते हैं।

लेकिन बड़े शहरों में जिस तरह हर रोज ईश्वर के बनाए रिश्ते तार-तार हो रहे हैं। पति-पत्नी के जन्मों का साथ अधर में ही छूट रहा है। जिससे शादी का बंधन कमजोर पड़ता जा रहा है। इसके बढ़ते मामले ज्यादातर महानगरों में दिखाई पड़ रही है।

आपको हैरानी होगी कि आईटी सिटी बैंगलोर में रोजाना 20 से भी ज्यादा तलाक के मामले दर्ज हो रहे हैं। 10 हजार शादीशुदा जोड़ों के मामले कोर्ट में सुनवाई की कतार में हैं।

लेकिन आज की इस भागती दौड़ती जिंदगी में इंसानों के लिए शायद ऊपर वाले के बनाए इस रिश्ते के भी कोई मायने नहीं रह गए हैं। जन्म-जन्म तक साथ रहने की कसमें अब छोटी सी बात पर भुला दी जाती है।

देश में प्रतिभावान लोगों का शहर माने जाने वाले आईटी सिटी बैंगलोर की एक कड़वी हकीकत बयां कर रहे हैं। यहां पिछले 6 महीने में 2 हजार से ज्यादा टूटे रिश्ते कुछ ऐसी ही कहानी बयां कर रही है। हैरानी वाली बात ये भी है कि ज्यादातर मामलों में तलाक की पहल पत्नियों की तरफ से की गई है।

शहरों में लगातार बढ़ रहे तलाक के मामले रिश्तों की परीक्षा ले रहे हैं। लेकिन देश की ये पढ़ी-लिखी पीढ़ी इस परीक्षा में फेल होती नजर आ रही है। जानकारों की मानें तो पैसों की चमक ने रिश्तों को कमजोर बना दिया है।

दरअसल आज महिलाएं इतनी आत्मनिर्भर हो चुकी हैं कि वो बिना हमसफर के जिंदगी गुजारने का माद्दा रखती हैं। महीने में लाखों रुपए कमाने वाला शौहर भी अपनी शरीके-हयात की रोज रोज की खिटपिट सुनने का आदी नहीं रहा। यानी दोष न लड़की का है और न लड़के का। दोष है हमारी बदलती हुई लाइफस्टाइल का।

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